
डॉ. कृष्णा जोशी, प्रसिद्ध कवयित्री, गुजराती कॉलेज, इंदौर
याद आता है पुराना जमाना,
जो लगता था बहुत सुहाना।।
नानी के गाँव जाना, चूल्हे पर सिंकी रोटी खाना,
खेत से ताज़ी सब्ज़ी तोड़कर लाना, चटनी सिलबट्टे पर बनाना।।
वाह वो नीम की छाँव, गोबर से सन जाते पाँव,
फिर कुएँ के पास आना,
रस्सी से पानी खींचकर लाना, छप-छप करके पाँव धुलाना।।
वो चाय की चुस्की लगाना,
वाह रे ख़ूबसूरत पुराना जमाना।।
ज़िंदगी भर भूले न यह समय सुहाना,
वाह रे वो पुराना जमाना,
जो लगता था बहुत सुहाना।।
गुरुजी यदि बाहर आते दिख जाएँ तो तुरंत उन्हें शीश नवाना,
वो बस्ता-पट्टी लेकर पाठशाला जाना।
कैसे भूलें उन्हें, जिन्होंने यह संस्कार दिलाया, व्यवहार निभाना सिखाया।।
वाह रे वो पुराना जमाना,
जो लगता था बहुत सुहाना।।
बिजली चली जाती तो चिमनी जलाना,
सेल बैटरी खोजकर ट्रांजिस्टर चलाना,
फिर सबको भजन सुनाना।
बिजली आए तो वैसे ही खुशी से चिल्लाना।।
याद आता है बहुत वह पुराना जमाना, बहुत सुहाना।।
वाह रे वो पुराना जमाना,
जो लगता था बहुत सुहाना।।

Superrrrrr