
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
महिदपुर रोड और कसारी का रास्ता आज जैसा है, वैसा पहले बिल्कुल नहीं था. शाम को शुगर मिल में 10 से 6 की ड्यूटी करने वालों के जाने के बाद यह रास्ता अक्सर सुनसान हो जाता था. कभी-कभी इक्का-दुक्का दूधवाला ही आता और वापस लौटता; अन्यथा पूरा रास्ता सूना ही रहता.
हम उस समय कसारी से महिदपुर रोड रहने आए थे. कसारी से महिदपुर रोड तक की सड़क तब बनी नहीं थी. कच्ची मुरहम और बोल्डर डालकर तत्कालीन सरपंच पर्वतसिंहजी के प्रयासों से बनाई गई थी. फिर भी कई जगह कीचड़ रहता था. बारिश के दिनों में सड़क के किनारे बेशरम नामक जंगली वनस्पति उग आती थी. इसकी टहनियाँ सूखने के बाद भी बारिश या नमी मिलने पर फिर से हरी हो जाती थीं. सफेद और बैंगनी फूलों वाली इस जहरीली वनस्पति को पशु भी नहीं खाते थे, लेकिन गरीब लोग इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर लेते थे.

यह बात श्राद्ध पक्ष की है. पितरों के लिए खीर-पूड़ी बनाने के लिए बाबूजी ने दूध खरीदने का आदेश दिया. महिदपुर रोड की होटल या दूधवाले से दूध लेना उनके लिए उपयुक्त नहीं था, क्योंकि उनका मानना था कि होटल वाले दूध में पानी मिला देते हैं.
शाम 6 बजे स्कूल से लौटकर मैंने दूध लेने के लिए कसारी गांव का रुख किया. दो किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग 45 मिनट लगे. जैसे ही मैं रामसिंह दा की मावा भट्टी पर पहुंचा, उन्होंने बताया कि अभी सभी दूध का मावा बना दिया गया है, थोड़ी देर प्रतीक्षा करनी होगी.
जैसे ही मैं वहां बैठा, मेरे चारों ओर अंधेरा फैल गया. कैसे वापस जाऊँगा? रास्ता कितना डरावना है! मन में यही सवाल था. थोड़ी देर बाद दूध आया, और मेरी केटली भर दी गई. रामसिंह दा ने मेरी सुरक्षा की व्यवस्था भी की. मुझे स्कूल के पास के खाल और नागदेवता के ओटले तक छोड़ दिया.
लेकिन असली चुनौती अब शुरू हुई. डेढ़ किलोमीटर का सफर मुझे अकेले तय करना था. पालीवाल जी के खेत के पास अंधेरा और घना हो गया. मेरे कदम तेज थे, लेकिन मन कांप रहा था. तभी सड़क के किनारे एक सफेद आकृति लहराती हुई दिखाई दी. मेरे दिमाग में भूत-प्रेत के किस्से दौड़ गएसफेद रंग, घुंघरुओं की आवाज, पीछे-पीछे आने या आगे होने का डर.
बारिश की बूँदें, मेढक और झिंगुर की आवाजें सब घुंघरु की तरह सुनाई देने लगीं. परछाई हर कदम पर मुझे डराती रही. मैं लगभग बेहोश होने ही वाला था. तभी याद आया. हनुमान चालिसा पढ़ने से भूत-प्रेत पास नहीं आते. मेरे पास हनुमान चालीसा याद नहीं थी, लेकिन मैंने जोर से कहा जय हनुमान जय हनुमान जय हनुमान.
धीरे-धीरे मैं जामफल वाले कुएँ तक पहुँचा. वहां कुछ लोग दिखाई दिए, जो मुझे जानते थे. वे भी महिदपुर रोड की ओर जा रहे थे और स्टेशन तक मेरे साथ चले.
तभी मैंने देखा कि वह डरावनी परछाई असल में सफेद रंग का माइलस्टोन थी, जो हर 100 मीटर पर दिखाई दे रहा था. मैं भूत समझ बैठा था.
इस तरह मेरी एक साहसिक यात्रा का अंत हुआ. डर और कल्पना ने मुझे हिलाया, लेकिन हनुमान की शक्ति और खुद पर विश्वास ने मुझे सुरक्षित घर तक पहुँचाया.

Achchi smritiya hai,,,, school life ki…chalo sach to samaz aaya..hanuman ji ne sankat har liya
😄😄 बहुत दिलचस्प
मजेदार संस्मरण,लेखन शैली में अंत तक प्रवाह बना रहा 👌👌
बचपन दिलचस्प संस्मरण किंतु मजेदार 👌