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अरमान

बरसों से सूखी नदी में पानी देखने की चाह लिए किसान दंपत्ति जब बाढ़ में अपनी फसल बहते देखते हैं, तो उनका “अरमान” मटमैले पानी के साथ बह जाता है। यह कहानी मेहनत, उम्मीद और प्रकृति की विडंबना का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है।

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डाक चाचा: पत्रों में बसी यादें

डाकिया हमारे बचपन और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। उनका नाम सुनते ही एक अलग ही दुनिया आंखों के सामने जीवंत हो उठती — खाकी वर्दी, साइकिल की खड़खड़ाहट और हाथों में थैला। वे सिर्फ़ पत्र और पार्सल नहीं लाते थे, बल्कि अपनों का प्यार, उम्मीद और आशीर्वाद भी अपने साथ लाते थे। इस लेख में हम उन दिनों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जब हर चिट्ठी का इंतजार दिल की धड़कनें बढ़ा देता था और हर पार्सल में खुशी और उत्सुकता समाई होती थी।

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औषध या टोना

“ज्ञान जब अज्ञान में डूब जाए तो टोना कहलाता है…
पर समझो तो वही औषध है, वही विद्या।” गाँव के लोग जिन शब्दों को मंत्र समझते थे, वे दरअसल उपचार थे और जिस औरत को ‘डायन’ कहा गया, वही जीवन लौटाने वाली वैद्य निकली। विश्वास और अंधविश्वास की पतली सरहद उस रात फिर धुंधली हो गई।

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छोड़ आये अपना वो गांँव…

“छोड़ आये अपना वो गाँव” में कवि अपने बचपन और गाँव की यादों को भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं। यह कविता गाँव की सरल, प्राकृतिक और आत्मीय जीवन शैली के सुंदर चित्रण से भरी है—बैलगाड़ियाँ, खेतों की हरियाली, पनिहारन की पायल की झनकार, बुजुर्गों की चौपाल और सुबह की ग्रामीण रौनक। शहर की चमक-धमक, गगनचुंबी इमारतें और व्यस्त जीवन के बीच कवि को गाँव की मिट्टी, पेड़ों की छांव और अपनापन याद आता है। कविता यह दर्शाती है कि चाहे जीवन कितनी भी व्यस्त या आधुनिक क्यों न हो, अपने गाँव और सरल जीवन की याद हमेशा हृदय में बनी रहती है, और व्यक्ति को फिर से लौटने की लालसा जगाती है।

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बरसात में…

बरसात को जीवन, प्रकृति और मानवीय अनुभवों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। बारिश की बूंदें पत्तों और फूलों पर मोती की तरह टपकती हैं, बिजली के तारों पर झिलमिलाती हैं और धरती में अमृत जैसी बूंदों के रूप में समा जाती हैं। वहीं, जर्जर मकान ढहते हैं और लोग अपने घरों और यादों को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। शहर और गाँव की सड़कों पर बच्चे बारिश में खेलते हैं, नदियाँ अपने भीषण बहाव में सब कुछ बहा लेती हैं, और जानवर तथा पक्षी अपनी परिस्थितियों से जूझते हैं। इसके बीच, बरसात जीवन में रिश्तों, साहस और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करती है। कविता यह दर्शाती है कि बरसात का सौंदर्य और जीवन में उसकी भूमिका पहले जैसी रह गई है, लेकिन अब वह पहले जैसी रूमानी नहीं लगती।

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बादल फटने की त्रासदी

वर्ष 1983 में मेरी प्रथम प्रशासनिक तैनाती के दौरान अल्मोड़ा जिले के दूरस्थ करमी गाँव में घटित बादल फटने की घटना ने मुझे पहाड़ों में जीवन और प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता का जीवंत अनुभव कराया। पैदल मार्ग से उच्च पहाड़ी इलाक़ों तक पहुँचना कठिन था, लेकिन गाँववालों की व्यथा और घटना के दृश्य ने मेरी संवेदनाएँ झकझोर दीं। इस घटना में लोगों के घर बह गए, कई लोग घायल हुए और मृतक भी हुए। उस समय का अनुभव आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है और यह प्रशासनिक कार्य के दौरान मिली असली चुनौती और सीख का प्रतीक बना।

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वो गाँव की कच्ची सड़क…

गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।

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धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

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लिहाफ़ : कहानी जो सुनी थी…

पूस की रात, पतले लिहाफ़ और भूख से जूझते एक परिवार की कहानी में ठंड, गरीबी और संघर्ष के बीच भी उम्मीद की रोशनी झलकती है। जब रिक्शा चला कर लाया गया आटा-दाल और मुनिया की मुस्कान से ढेबरी से ज़्यादा रौशनी उनकी झोपड़ी में फैलती है, तो यह कहानी केवल ठंड की नहीं, जुगत और जज़्बे की भी बन जाती है।

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