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लिहाफ़ : कहानी जो सुनी थी…

पूस की रात, पतले लिहाफ़ और भूख से जूझते एक परिवार की कहानी में ठंड, गरीबी और संघर्ष के बीच भी उम्मीद की रोशनी झलकती है। जब रिक्शा चला कर लाया गया आटा-दाल और मुनिया की मुस्कान से ढेबरी से ज़्यादा रौशनी उनकी झोपड़ी में फैलती है, तो यह कहानी केवल ठंड की नहीं, जुगत और जज़्बे की भी बन जाती है।

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गांव में क्या रखा है…

लोग कहते हैं, “गांव में क्या रखा है?”
पर मेरे लिए गांव सिर्फ एक जगह नहीं, मेरे बचपन की थाती है।

वहीं दादी की कहानियां थीं, मां के हाथों से खाया निवाला था, नीम की ठंडी छांव, खेतों की हरियाली और चौपाल की गर्मजोशी थी। कुएं का पानी, पगडंडियों की धूल और पुराने बक्सों में बंद वो मासूम दिन – सब वहीं छूट गए हैं।
गांव की मिट्टी में सिर्फ धूल नहीं, मेरी जड़ें हैं।
जो कहते हैं “गांव में कुछ नहीं रखा,”
शायद उन्होंने कभी गांव को जिया ही नहीं।

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बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

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एक पर्यावरणविद् मंच पर भाषण देते हुए, पीछे लक्ज़री कार का दृश्य

वे बेचारे……

यह व्यंग्यात्मक लेख आधुनिक समाज में बढ़ते दिखावटी पर्यावरणवाद और नैतिक पाखंड पर तीखा प्रहार करता है। कहानी एक ऐसे गुरुजी से शुरू होती है, जो गांव की पाठशाला में बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और सादगी का पाठ पढ़ाते हैं। उनके आदर्श, उनके विचार और उनका जीवन सब कुछ इतना प्रभावशाली होता है कि लोग उन्हें भगवान जैसा मानने लगते हैं।

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