तलाश

शहर में अपने लापता बेटे की तलाश करती बिहार की एक संघर्षशील माँ

पूनमसिंह वत्सला, जमशेदपुर

बिहार के मुंगेर जिले के एक छोटे से गाँव में सावित्री अपने परिवार के साथ रहती थी। उसका इकलौता बेटा प्रताप था। पति खेती-बाड़ी करके किसी तरह परिवार का खर्च चलाते थे। घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, लेकिन परिवार में प्रेम और अपनापन था।

धीरे-धीरे प्रताप बड़ा हुआ और दसवीं कक्षा पास कर चुका था। एक दिन उसने अपनी माँ से कहा,
“माँ, क्या हमारी परेशानियाँ कभी दूर नहीं होंगी? मैं शहर जाकर कोई नौकरी कर लेता हूँ।”

सावित्री ने उसे समझाते हुए कहा,
“नहीं बेटा, चाहे कितनी भी परेशानी हो, हम सब साथ तो हैं। तुम्हारे बाबूजी जो कमाते हैं, उससे किसी तरह घर चल ही जाता है।”

उसी गाँव में रमेश नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसका काम भोले-भाले ग्रामीणों को शहर में नौकरी का लालच देकर ले जाना और उन्हें बंधुआ मजदूरों की तरह काम पर लगवा देना था। बदले में वह मोटी रकम वसूल करता था। प्रताप भी उसकी बातों में आ गया।

इसी बीच प्रताप के पिता की तबीयत बहुत खराब हो गई। डॉक्टरों ने ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपये का खर्च बताया। रमेश ने मौका देखकर कहा,

“काकी, प्रताप को मेरे साथ शहर जाने दीजिए। वहाँ अच्छी नौकरी मिलेगी। पैसा कमाएगा तो काका का इलाज भी हो जाएगा।”

लेकिन सावित्री तैयार नहीं हुई। उसने कहा,

“नहीं, मैं थोड़ा-थोड़ा करके पैसे जमा कर लूँगी। अपने बेटे को शहर नहीं भेजूँगी।”

रमेश चला गया, लेकिन कुछ दिनों बाद प्रताप के पिता की हालत और बिगड़ गई। एक सुबह सावित्री घबराकर बोली,

“प्रताप, जल्दी उठो! तुम्हारे बाबूजी की तबीयत बहुत खराब हो रही है।”

प्रताप ने माँ का हाथ पकड़कर कहा,

“माँ, मैं इसी लिए तो कहता हूँ कि मुझे शहर जाने दो। मैं पैसे कमाकर बाबूजी का इलाज करवाऊँगा।”

उसकी जिद और पिता की हालत देखकर सावित्री की आँखें भर आईं। आखिरकार उसने भारी मन से बेटे को जाने की अनुमति दे दी।

रमेश प्रताप को शहर ले गया और एक केमिकल फैक्ट्री में काम पर लगा दिया। वहाँ काम करते हुए प्रताप को पता चला कि फैक्ट्री में बेहद जहरीले रसायन बनाए जाते हैं। कई मजदूरों के हाथ जल जाते थे, किसी की आँखों पर असर पड़ता था, तो कोई गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाता था।

एक महीना पूरा होने पर प्रताप अपनी मजदूरी माँगने गया। मालिक ने टालते हुए कहा,

“बाद में मिल जाएगी।”

एक सप्ताह बाद जब वह फिर पैसे माँगने पहुँचा तो मालिक ने उसे धमकाते हुए कहा,

“चुपचाप काम करो, वरना इसी केमिकल में डुबो दूँगा।”

प्रताप डर गया, लेकिन कुछ दिन बाद उसने फिर हिम्मत करके अपनी तनख्वाह माँगी। तब मालिक गुस्से में चिल्लाया,

“तुम्हारे बदले मैं रमेश को दो लाख रुपये दे चुका हूँ। अब पैसे उसी से माँगो।”

यह सुनकर प्रताप के पैरों तले जमीन खिसक गई। रमेश ने उसे केवल पाँच हजार रुपये दिए थे।

मालिक ने अपने गुंडों को आदेश दिया,

“ज्यादा बोले तो इसकी पिटाई कर दो और कहीं बंद कर दो, लेकिन मरना नहीं चाहिए।”

गुंडों ने प्रताप को बुरी तरह पीटा और फैक्ट्री के एक बंद कमरे में कैद कर दिया।

इधर गाँव में सावित्री जब बेटे को फोन करती, तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। धीरे-धीरे उसका संपर्क पूरी तरह टूट गया। माँ का दिल घबराने लगा। आखिर उसने ठान लिया कि वह अपने बेटे को ढूँढ़कर ही रहेगी।

पति ने समझाया,

“तुम कहाँ ढूँढ़ोगी? तुम्हें न उसका पता मालूम है, न यह कि वह किस फैक्ट्री में काम करता है।”

लेकिन एक माँ भला कैसे हार मानती? सावित्री शहर पहुँच गई। वह दर-दर भटकती रही, लोगों से पूछती रही, पुलिस थानों के चक्कर लगाती रही। उसके पास न बेटे की तस्वीर थी और न ही कोई पता, फिर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी।

एक दिन वह एक दुकान के बाहर बेंच पर बैठी रो रही थी। दुकानदार ने पूछा,

“माँजी, क्या बात है?”

सावित्री ने अपनी व्यथा सुनाई। संयोग से वह दुकानदार भी बिहार का ही रहने वाला था। उसने कहा,

“मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो शायद आपकी मदद कर सके।”

वह सावित्री को धीरज नाम के एक युवक के पास ले गया, जो कभी प्रताप के साथ काम करता था। धीरज ने सारी कहानी बता दी। अब सावित्री का विश्वास और मजबूत हो गया कि उसका बेटा कहीं न कहीं जीवित है।

वह सीधे उस फैक्ट्री में पहुँची जहाँ प्रताप काम करता था। मालिक से मिली, लेकिन उसे डाँटकर भगा दिया गया। फिर भी वह फैक्ट्री के बाहर बैठी रही और आने-जाने वाले मजदूरों से अपने बेटे के बारे में पूछती रही।

वह सबके सामने हाथ जोड़कर कहती,

“अगर आपके बेटे के साथ ऐसा होता तो आपके परिवार पर क्या बीतती? कृपया मेरे बेटे को ढूँढ़ने में मेरी मदद कीजिए।”

उसकी ममता और दर्द ने मजदूरों का दिल पिघला दिया। सबने मिलकर सच जानने का निश्चय किया। उन्होंने उस गुंडे को पकड़ लिया जिसने प्रताप को धमकाया था। दबाव पड़ने पर उसने सारी सच्चाई उगल दी।

सच्चाई सामने आते ही पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस फैक्ट्री पहुँची और उस स्थान तक पहुँची जहाँ प्रताप को कैद करके रखा गया था। गैरकानूनी तरीके से चल रही फैक्ट्री को सील कर दिया गया तथा मालिक और गुंडों को गिरफ्तार कर लिया गया।

सावित्री अब भी यही समझ रही थी कि उसका बेटा शायद जीवित नहीं होगा। तभी पीछे से एक आवाज आई,

“माँ…”

सावित्री ने पलटकर देखा। सामने प्रताप खड़ा था।माँ की आँखों से आँसू बह निकले। वह दौड़कर अपने बेटे से लिपट गई। दोनों देर तक रोते रहे।उस दिन एक बार फिर साबित हो गया कि माँ जब अपने बच्चे के लिए ठान लेती है, तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती। उसकी ममता हर मुश्किल, हर अंधेरे और हर बाधा को पार कर जाती है।

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