क्षणभंगुर जीवन मेरा…

नीलम राकेश, प्रसिद्ध लेखिका, सीतापुर रोड लखनऊ

अपने बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठे शेलेन्द्र कुमार सिन्हा अपलक एक छोटे बादल के टुकड़े को आकाश में अकेले अठखेली करते देख रहे थे। उनके अन्तस का एकाकीपन पूरी तीव्रता के साथ उनके ऊपर हावी था। अपना जीवन उन्हें इस निरीह क्लांत बादल के टुकड़े जैसा प्रतीत हो रहा था- कितनी समानता थी दोनों में। दोनों आजाद, अपने मन के मालिक, दोनों निरीह, बिल्कुल अकेले, नितांत अपरिचित। पूरी तन्मयता के साथ उस बादल के टुकड़े को देखते-देखते जैसे शैलेन्द्र कुमार सिन्हा उसके साथ एकाकार हो उठे।
डॉक्टरों की हिदायत पर उन्हें शराब छोड़नी पड़ी, जिसे छुड़ाने की हसरत लिये उनकी सहचरी इस दुनियाँ से विदा हो गई। आज इस बादल के टुकड़े को देखकर जब चाय की प्यास जागी तो अनायास ही सहचरी की याद हो आई। दिल में एक टीस उठी-सहचरी। हाँ वह सही अर्थों में सहचरी थी। हर सुख-दुःख में उसने उनका साथ निभाया था। अपनी पूरी उपेक्षा के उपरान्त भी इस पवित्र रिश्ते को पूरी निष्ठा के साथ निभाया था, उनकी हर आशा, अपेक्षा पर खरी उतरती गई थी। बिना किसी प्रतिदान की चाह के उसने उन्हें प्राणपण से चाहा था। जाने किस गुण के कारण उसने उन्हें अपना आराध्य मान लिया था और वे उसके प्राणप्रिय हो गये थे। जबकि प्रिय होने लायक भी वे उसे कुछ नहीं दे सके थे। जिसकी भर्त्सना करनी चाहिये थी उसकी मंगल कामना करते हुये उसने अन्तिम साँस ली थी। शायद भारतीय नारी का सही प्रतिबिम्ब थी वह।
बादल का वह टुकड़ा अन्य टुकड़ों से मिलकर विशाल रूप धारण कर चुका था। सूर्य को अपनी ओट में छुपाकर अपने बड़े होने के दर्प में चूर नजर आ रहा था। सचमुच कितना साम्य था शैलेन्द्र कुमार सिन्हा और इस बादल में। जब तक शैलेन्द्र कुमार सिन्हा रिटायर नहीं हुये थे एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी होने का दंभ उन पर छाया रहा। इसी के चलते उन्होेनंे कभी किसी को कुछ समझा ही नहीं। रिश्तेदार, नातेदार, मित्र, परिचित सब छूटते गये और उन्हें इसका एहसास भी नहीं हुआ। चाटुकारों से घिरे वे अपनी ही बनाई एक दुनियाँ में जीते रहे। भौतिक सुखों के पीछे भागते उनका मन कब अन्धी गलियों की ओर मुड़ गया उन्हें इसका भान भी नही हुआ। हर ऐब एक-एक कर उनमें समाहित होने लगे। पत्नी ने चेताया भी तो उन्होंने पत्नी को मूढ़ ठहरा दिया।
चढ़ते सूर्य को सभी नमन् करते हैं, उनके चारों ओर तो ऐसे ही लोगों का जमघट था। वे क्यों उनके गलत कार्यों की ओर इशारा करके उनकी नजरों में बुरे बनते। सबका अपना-अपना स्वार्थ जुड़ा था उन्हें प्रसन्न रखने में, सो वे जो कुछ करते सब मिलकर उसे ही सही ठहरा देते और उनकी जय-जयकार करते। वे स्वयं मूर्खों की तरह इस सबके पीछे छुपी धूर्त्तता को न पहचानकर अपनी प्रशंसा से आनन्दित होते रहे। कोई अगर उनका सच्चा हितैषी था तो वह थी उनकी अर्धांगिनी-पूजा। जो सचमुच पूजा की तरह पवित्र और सरल थी। उसने सदा उन्हें गलत कार्यों को करने से रोकने की चेष्टा की किन्तु ऐसे हर मौके पर उनका पुरूष होने का अहम् और पत्नी से ज्यादा जानकार होने का दम्भ आड़े आ गया और शायद क्षणिक लाभ पाने का लोभ भी वे संवरण नहीं कर पाये थे। भौतिकता की दौड़ में वे इतने आगे निकल आये थे कि ऊँच-नीच, सही-गलत सब गौण हो गया था। जो दिखाई देता था- जो अभीष्ट था वह था अपना स्वार्थ, अपना लाभ। इसके लिये कितना गिरना पड़े, कितनी गलत राह अपनानी पड़े, यह बात तुच्छ हो गई थी- निर्मूल थी।
आकाश पर आच्छादित बादल अब नन्हीं-नन्हीं बूँदों के रूप में बरसने लगा था, ठीक वैसे ही जेसे उनके अन्तस् का दम्भ अब धीरे-धीरे एकाकीपन की आँच पाकर पिघलने लगा था। दिल की टीस अब कुछ ज्यादा ही टीसने लगी थी। पिछली गल्तियों को अब वे महसूस कर रहे थे- स्पष्ट देख रहे थे। अथाह धन कमाने की चाह में क्या कुछ खो बैठे थे उसे अब सब खोकर एहसास कर रहे थे। कुछ समय पूर्व तक वे स्वयं को एक बहुत सफल इंसान मानते थे। जितना कुछ चाहा था सब तो पाया था। उनके पास गलत-सही तरीके से कमाया अथाह पैसा था। किस बैंक में कितना पैसा है उन्हें स्वयं भी ठीक से याद नहीं था किन्तु निश्चिन्त थे कि कई पीढ़ियाँ खा सकती हैं, इतना तो है ही। एक विशाल हवेलीनुमा कोठी सारी आधुनिक सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण, एक आज्ञाकारी बेटा और उसका भी चयन प्रशासनिक सेवा में उसकी स्वयं की प्रतिभा से हो चुका था। अच्छा ही हुआ अन्यथा उसके जैसा जिद्दी लड़का स्वयं को स्थापित करने के लिये उनकी सिफारिश और धन का प्रयोग कदापि न करता। कोई यूँ ही एक नजर में देखे तो क्या कमी थी उनके पास इसी गफलत में वे स्वयं भी जीये थे। प्रशासनिक अधिकारियों का परिवार, बेशुमार दौलत, कोठी, कार, सारी सुख-सुविधायें घर में एक समर्पिता अर्धांगिनी हर पल उनकी हर इच्छा पर मर मिटने को तत्पर और बाहर अनेक विवाहेत्तर सम्बन्ध, दोस्तों प्रशंसकों की रेल-पेल। जिन्दगी बिल्कुल जैसा वे चाहते थे वैसी ही तो चल रही थी।
बादल अब तेजी से बरसने लगा था। शायद उनके अन्तर्मन की पीड़ा को अभिव्यक्ति देना चाहता था। सजल हो आये अपने नयन और बादल उन्हें एकसार प्रतीत हुये। दोनों बरसकर खाली हो जाना चाहते थे। शायद पीड़ा से मुक्ति मिले। अतीत उन पर छाने लगा। उनकी सारी उपलब्धियों, सफलताओं पर अचानक पूर्ण विराम लग गया था। सब कुछ जैसे मरूस्थल की मृगमरीचिका सिद्ध हो गया। सब सारहीन-अर्थहीन होकर रह गया। उनके रिटायर होने से दो माह पूर्व ही सदा साथ निभाने वाली चिरसंगिनी उनकी सहृदय अर्धांगिनी सदा के लिये उनका साथ छोड़ चिरनिद्रा में सो गई। कुछ समय के लिये बेटा उन्हें अपने साथ ले गया, शायद उनके अकेलेपन को कम करने के लिये, किन्तु उसकी एक बात उन्हें कितना अकेला कर गई थी, इसका शायद उसे एहसास भी नहीं था। पत्नी का जाना उस समय तो उन्हें एक साधारण घटना ही लगी थी। उसकी जुदाई तो वे अब पूरी शिद्दत से महसूस कर रहे थे।
जैसे नन्हा बादल शेष बादल से जा मिला था वैसे ही वे भी बेटे के परिवार में जा मिले थे और पूरे अधिकार से बेटे को अपनी अपनाई राह पर चलने की सीख देने लगे थे। जिस बेटे पर उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था, जिसके होने में सिर्फ उनके अंश बीज के अतिरिक्त कोई योगदान नहीं था, उस पर अपने विचार लादने की अनधिकार चेष्टा करने लगे थे। परन्तु उनकी अर्धांगिनी ने पति से निराश होकर अपने बेटे की परवरिश करते समय उसके अन्दर आदर्श कूट-कूट कर भर दिया था ताकि जिस दर्द के साथ वह जीयी थी उस दर्द से उसके बेटा-बहू अछूते रहें और समाज में खुशियों का प्रकाश फैला सकें। जिस पल उन्होंने नाराजगी के साथ बेटे को लक्ष्मीजी के स्वागत का आदेश दिया उसी पल ज्वालामुखी फट गया। जाने कब से खौल रहा लावा शब्दों के रूप में उफान के साथ उबल-उबल कर बाहर आने लगा। उनकी अन्तरात्मा पर हथौड़े की चोट की तरह पड़े थे बेटे के एक-एक शब्द। उसके शब्द-बाणों से आज भी मर्माहत थे वे। कैसे निष्ठुर की तरह बोला था उनका लाड़ला, ‘‘यह राह आपको ही मुबारक पिताजी। यह आपको ही रास आती हैं क्या मिला आपको इस डगर पर चलकर, जो मुझे भी इस अन्धे कुएँ में धकेलना चाह रहे हैं? माँ को तिल-तिल कर जलते देखा है मैंने। आप न ही एक अच्छे पति बन सके, न ही अच्छे पिता, न ही अच्छे अधिकारी और तो और एक अच्छे इंसान के भी कौन से लक्षण हैं आप में जिसे देखकर मैं आपका बेटा होने पर गर्व कर सकूँ? काश कि मैं आप जैसे लखपति-करोड़पति, साधन सम्पन्न, समर्थ व्यक्ति का बेटा न होकर एक गरीब मेहनती इंसान का बेटा होता। कम से कम लोगों के सामने सिर उठाकर कह तो पाता कि मैं इस मेहनतकश-ईमानदार इंसार का बेटा हूँ जिसने आधा पेट खाकर भी मुझे योग्य बनाया। परन्तु आज तो स्थिति यह है कि मुझे आपके बेटे के रूप में जाना जाता है और जब भी मेरे नाम के साथ आपका नाम लिया जाता है, मैं शर्मसार हो जाता हूँ और ऐसा स्थान तलाशने लगता हूँ जहाँ जाकर मैं छुप जाऊँ और इस कटु सच्चाई से बच पाऊँ कि आप मेरे पिता हैं।’’
अवाक्, स्तब्ध देखते रह गये थे वे अपने बेटे को- अपने खून को। एकदम झनझनाकर कुछ टूटा था, शायद मोहपाश या शायद वे स्वयं ही टूट गये थे। थके-हारे जुआड़ी की तरह लौट आये थे अपनी इस हवेली में, नितांत अकेले-रिश्तों के शव को ढोते हुए। अब बस मित्रों का ही आसरा था। परन्तु रिटायर होते ही वे सब भी स्वप्न का छलावा साबित हुये। आँख खुली तो कुछ भी नहीं था। एक अपरिचित अकेलापन हर ओर से उन्हें डसने लगा जिन्हें मित्र समझ करके जीते आये थे, जिनके भरोसे अपनों से दूर हो गये थे, वे तो सत्ता के पुजारी निकले। पद गया और वे भी अन्तर्धान हो गये।
अपने इस क्षणभंगुर जीवन की मीमांसा करने पर उन्हें आत्मग्लानि होने लगी। जिसके लिये पथभ्रष्ट हुये- यह कोठी-बँगला, गाड़ी और दौलत कमाई्र वो बेटा ही उन्हें आदर के योग्य नहीं मानता। जीवनसंगिनी को धन के अतिरिक्त कभी कुछ नहीं दिया, सदा महत्वहीन ही समझा और आज उसके बिना कितने अकेले रह गये हैं। अब उसकी छोटी-छोटी बातें मन को छूती हैं। जो कुछ आज उनके पास है। वह नश्वर है। सब यहीं रह जायेगा परन्तु मन का जो सुकून इस उम्र में चाहिये था वही उनके पास नहीं है। उनके पास है तो बस पछतावा और अपनी भूल का एहसास।
सूर्य की ऊँचाई को छूने की इच्छा से अपने चरित्र की बलि देकर जो कुछ भी पाया उनके प्रतिदान में अपनों का प्रेम और आदर खोकर वे आत्मग्लानि के दलदल में धँस गये थे और मन का हर कोना रीता रह गया था।
बादल पानी बरसाकर छँट गया था और सूर्य अपनी पूरी तेजी के साथ आकाश में चमक रहा था। इस जगत को अलोकित करता हुआ जैसे उन्हें ढाढ़स बँधा रहा हो कि उनकी भूल से सीख लेकर उनका पुत्र सत्य-मार्ग पर बढ़ रहा है, दुनियाँ को सत्य और प्रेम का प्रकाश देने हेतु।
आँखों में आशा के दीप लिये शैलेन्द्र कुमार सिन्हा ने सूर्य को नमन किया और अपलक खुले आकाश को निहारने लगे।

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3 thoughts on “क्षणभंगुर जीवन मेरा…

    1. हार्दिक धन्यवाद रेणु जी आपको रचना पसंद आई जानकर प्रसन्नता हुई.

  1. लोभ लिप्सा व्यक्ति को कितना गिरा सकती है और अंत में क्या हाथ आता है इसको आप कहानी में पूरा उतार लाई हैं।बहुत अच्छी कहानी ।बधाई स्वीकारें,नीलम जी।

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