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नारी — जननी भी, शक्ति भी

मत दो गहने सोना चांदी,नहीं मांगती औरत।
ये बस चाहे वक्त वफाएं नहीं चाहती दौलत।।
मत छीनों आजादी इनकी,ये भी तो इंसान यहांँ।
खुशियां जग से ही मांगेंगीं,जाएंगी और कहांँ।।

जो आगे कुछ बढ़ना चाहे,क्यों आरोप लगाए।
घर बाहर में चैन नहीं,नीचे खींच गिराए।।
जो जननी है जग में औरत,उसका सम्मान नहीं।
भोग समझते हैं बस इनको,जनती संतान यही।।

निर्मल है चंचल ये कोमल,होती कमजोर नहीं।
प्रेम हृदय से ये करतीं हैं,समझे है गलत सही।
मत सोचो आश्रित है जग में,जो यूंँ ठुकराते हो।
कर्तव्यों का पालन करतीं,कटु वचन सुनाते हो।।

नारी तो नारी होती है बहन यही मातु यही।
पत्नी बेटी होती है ये,सुबह यही शाम यही।।
घूरे नैना गंदी चितवन,कुछ जरा लिहाज करो।
सपन सलोने इनके भी हैं,इनका सम्मान करो।

अनामिका, मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका जमशेदपुर

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