मीरा का मन

सवितासिंह मीरा, जमशेदपुर

तू कहती तेरे गिरधर गोपाल,
यह कैसा मायाजाल?
नागर को तेरा कहाँ है भान,
देख जरा तू अपना हाल।

राणा को कर दिया दरकिनार,
त्याग दिया सारा घर-द्वार,
क्यों जिद पर है तू अड़ी?
यह कैसा अनदेखा प्यार?

राधा है केशव की चाह,
रुक्मिणी संग रचाया ब्याह,
वह तो ठहरे चितचोर,
कैसे पावेगी तू उनकी थाह?

नहीं चाहा कुछ भी पानी,
मैं मोहन की दीवानी,
वो रहते मेरे मन में,
बस मोहन को अपना मानी।

अनुराग था ऐसा मीरा का,
सिर्फ पाना न ध्येय जीवन का,
बसते मीरा के उर में मोहन,
वह करती बस अपने मन का।

सच्चे प्रेम की पराकाष्ठा,
विष पीते ही बन गई सुधा,
निस्वार्थ प्रेम की अमिट मिसाल,
मीरा संग मोहन बसे सदा।

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