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मैं हूँ धुआँ…

द्ध और प्रदूषण के कारण उठता काला धुआँ, जो आसमान को ढकते हुए विनाश और पर्यावरण संकट का प्रतीक बन गया है।

राकेश चंद्रा

मैं हूँ धुआँ.. काला-काला, दैत्याकार।
मुझे उठना है पृथ्वी से आसमान तक।

पल रही है एक महत्वाकांक्षा मेरे भीतर
नील गगन की छत्रछाया में तैरते चाँदी जैसे बादलों को धकियाना,
उन्हें ठिकाने लगा देना।

मैं एक दिन ढँक दूँगा
सुदूर आकाश के नीलेपन को।

मेरे भीतर छिपे हैं न जाने कितने भग्नावशेष
कच्चे-पक्के भवनों के,
और उनके भीतर पल रहे असंख्य जीवों के।

मेरे भीतर दब गई हैं
मासूम बच्चों की किलकारियाँ,
स्त्रियों का सम्मोहक हास-परिहास,
और वृद्धजनों की प्रार्थनाओं के स्वर।

मैं विषाक्त कर दूँगा पूरे वातावरण को,
और करता रहूँगा
आसमान की ओजोन परत में छेद।

मुझे नफ़रत है
हँसती-खेलती ज़िंदगी से।

मुझे पसंद हैं गोला-बारूद और हाहाकार मचाते
पृथ्वी की छाती को रौंदते बम, मिसाइलें और ड्रोन,
जो खूब धुआँ तो उड़ाते हैं,
पर यह नहीं देखते
कि मरने वाला कौन था।

मुझे पसंद है हर वह आग
जो मुझे अपने अंक में
बंद मुट्ठी की तरह संजोकर रखती है।

मुझे तो फैलानी है
अपनी कालिमा
अंतरिक्ष से भी आगे।

मैं धुआँ हूँ
उड़ना चाहता हूँ बार-बार,
काला-काला, दैत्याकार!
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