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द्ध और प्रदूषण के कारण उठता काला धुआँ, जो आसमान को ढकते हुए विनाश और पर्यावरण संकट का प्रतीक बन गया है।

मैं हूँ धुआँ…

यह कविता धुएँ को एक दैत्याकार शक्ति के रूप में चित्रित करती है, जो युद्ध, बम, मिसाइलों और आग से जन्म लेकर पूरे वातावरण को विषाक्त कर देना चाहती है। यह केवल प्रदूषण की नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आत्मविनाश की कहानी भी है।

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