
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
पंद्रह अगस्त मनाते हैं सब,
हो जैसे कोई त्योहार,
देशभक्ति हो जाती है
सबके सिर भरपूर सवार।
झंडे और तिरंगे
चहुँ ओर लहराएँ,
बच्चे, बूढ़े और जवान
जय हिंद के नारे लगाए।
जश्नबाजी से पूरे देश में
छा जाती है बहार,
हर जगह सुनाई देता है
देशभक्ति का अलंकार।
पर सच्ची देशभक्ति क्या है,
न कोई समझना चाहता है,
एक दिन हुल्लड़बाजी कर
हर कोई भूल जाता है।
स्वतंत्रता दिवस है प्रतीक
शहीदों के दिए बलिदान का,
समझो इसकी गरिमा को,
हर दिन करो इसका सम्मान।
जिस झंडे को गाजे-बाजे से
फहराकर करते अभिमान,
दूजे दिन सड़कों पर फेंककर
करते तिरंगे का अपमान।
क्या यही है देशभक्ति?
मातृभूमि की कद्र नहीं,
फैलाते दिन-रात गंदगी,
मानव बिल्कुल सभ्य नहीं।
अरे, हमसे अच्छे तो पशु हैं,
राग, बैर न द्वेष करें,
पान, तंबाकू, गुटखा खाकर
न दूषित परिवेश करें।
जल या स्थल में रहकर भी
कुदरत का करें पूर्ण सहयोग,
इनके तो अवशेष भी
आते हैं पूर्ण उपयोग में।
है एकता इनका हथियार,
करते अपने साथियों से प्यार,
न जाति-पाँति का भेदभाव,
ये रखते हैं सबसे सद्भाव।
हे मानव, कुछ सीखो इनसे,
हे मानव, कुछ सीखो इनसे।
गर देशभक्ति दिखलानी है,
रचनी नई कहानी है,
तो अब भी समय है, सुधर जाओ,
पंद्रह अगस्त के अलावा भी
देशभक्ति दिखलाओ।
स्वच्छता और सुरक्षा का
सब मिलकर बीड़ा उठाओ,
भाईचारे से साथ में रहकर
देश की एकता बढ़ाओ।
यही सच्ची देशभक्ति होगी,
एकता, स्वच्छता और सभ्यता ही
हमारे देश की असली शक्ति होगी।

बहुत सुंदर वंदे मातरम 🇮🇳🇮🇳