
रेणु गुप्ता, जयपुर

जयपुर के एक प्रतिष्ठित तीन सितारा होटल में कार्यरत लगभग तीस बरस की शेफ़ युवती शगुन के तीन हज़ार स्क्वेयर फीट के खूबसूरत घर का आज गृह प्रवेश है।
उसके माता-पिता ने ज्यों ही नए घर के बाहर लगी नेम प्लेट पर ‘राज-कमल लोक’ लिखा देखा, वे भौंचक्के रह गए। “ये…ये… हमारे नाम लिखे हैं बिटिया? मेरे राजकुमार का राज और माँ के कमला का कमल?”
“हाँ बाऊ जी, आप दोनों के ही नाम हैं।”
दोनों माता-पिता भाव-विह्वल हो आँसुओं के समंदर में डूब गए।
“बिट्टो, ये सचमुच तेरा घर है, तेरा अपना घर?”
“मेरा नहीं माँ, आप दोनों का घर।”
“बिट्टो, जीती रह। तूने हमारा नाम रोशन कर दिया। तू तो सौ बेटों से बढ़ कर है।”
शगुन ने माँ को अपनी बाँहों में भींच लिया।
“बिटिया, तूने आज हमारा मान बढ़ा दिया। मैंने इसी जगह पर बरसों समौसे बेचे थे। आज उसी जगह में तूने ये आलीशान घर बनवा दिया। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, मेरे नसीब में कभी इस जैसी शानदार जगह में आ कर रहना लिखा होगा। सदा सुखी रह बिटिया।” पिता ने शगुन से कहा।
दोनों को यूँ भाव-विभोर देख शगुनी की आँखें भी भीग आईं।
उन तीनों का वो पूरा दिन सुबह गृह-प्रवेश की पूजा, उसके लिए आये रिश्तेदारों और परिचितों और दोपहर को पार्टी में आये मेहमानों के साथ बीता।
आगंतुकों का ताँता शाम तक बंधा रहा।
शाम के सात बजे आखिरी अतिथि को विदा कर तीनों माता-पिता और शगुन मुदित मन थक-हार कर घर के सामने के बगीचे में हरसिंगार के पेड़ तले बैठे थे।
“माँ, पारिजात के इन नन्हे-नन्हे फूलों की कितनी प्यारी भीनी-भीनी खुशबू फ़ैली हुई है। जब घर का कंस्ट्रक्शन शुरू होने वाला था, तब बिल्डर इसे और उस गुलमोहर के पेड़ कटवाने वाला था, लेकिन मैंने उसे इन्हें कटवाने के लिए मना कर दिया था। सही किया न माँ?”
“बिलकुल सही किया, बेटा। इनकी मीठी-मीठी सुगंध हर तरफ फ़ैली हुई है। गर्मियों में इस गुलमोहर पर भी बहुत सुन्दर फूल आयेंगे।”
“हाँ माँ, इसी लिए तो नहीं कटवाए ये।”
“बिट्टो, अब तो तुझे नौकरी करते इतने बरस बीत गए। तूने अपना इतना बढ़िया घर भी कर लिया। अब तो अपने मन-पसंद लड़के से शादी कर ले। अब हमारी उम्र हो आई है, कब ऊपर वाले का बुलावा आ जाए, कुछ पता नहीं। शादी के लिए हाँ कर दे बिटिया।” माँ ने उससे कहा।
“तू जिससे कहेगी, मैं उसी से तेरी शादी कर दूंगा। बस ये बता दे, तू किससे शादी करना चाहती है?”
“बाऊ जी, मैं आपको कितनी बार कहूँ, अभी हाल-फिलहाल मुझे शादी करनी ही नहीं है। मुझे अभी अपनी नौकरी में बहुत तरक्की करनी है। शादी के बारे में मैंने अभी तक कुछ सोचा ही नहीं।”
रात हो आई थी। शगुन और उसके माता-पिता सोने जा चुके थे, लेकिन शगुन की आँखों में आज नींद नहीं थी।
अनायास कब अतीत के स्याह-उजले सायों ने उसे आकंठ घेर लिया, उसे एहसास न हुआ।
तब वह मुश्किल से चौदह बरस की रही होगी, जब फैक्ट्री में कटिंग मशीन में उसके पिता का दाहिना हाथ कट गया था और वे अपाहिज हो गए थे।
पिता ही एकमात्र कमाने वाले थे, सो उस दुर्घटना के बाद परिवार के सामने दो वक़्त की रोटी जुटाना दूभर हो गया था। बहुत मुश्किल से वो दिन बीते। माँ घर-घर खाना बनाने का काम करती और बचे समय में सिलाई करती।
उनकी बस्ती शहर के मुख्य बस स्टैंड के पास ही थी। शगुन दोपहर को स्कूल से लौट एक टोकरी भर समौसे बना देती और पिता बड़ी मुश्किल से एक हाथ से उसे थाम शाम को बस स्टैंड पर समौसे बेचते।
माँ के हाथ में जादू था और माँ से वही जादू शगुन को विरासत में मिला था। माँ ने शगुन को बेहद चटपटे और लज्ज़तदार समौसे बनाना सिखा दिया था।
सो बस स्टॉप पर उसके बनाए समौसे शाम को हाथों-हाथ बिक जाते।
उनकी गृहस्थी की गाड़ी अब पटरी पर आ गई थी।
उस दुर्घटना में हाथ गंवाने के दो-तीन बरसों बाद पिता ने कृत्रिम हाथ लगवा लिया था और अब वे हर काम बड़ी आसानी से कर लेते।
कभी कभार त्योहारों या छुट्टियों के मौसम में जब बसों में यात्रियों की भीड़ शिद्दत से उमड़ती, उनकी समौसों की खपत दुगुनी-तिगुनी हो जाती। उन दिनों में कभी-कभार वह पिता के साथ उनका हाथ बँटाने बस अड्डे चली जाया करती।
बस स्टॉप के ठीक सामने शहर के रईसों की बड़ी-बड़ी कोठियां थीं जिन्हें देख वह अक्सर सोचा करती, ‘काश उनका भी एक ऐसा शानदार घर होता।’
एक दिन उसने पिता से पूछा, “बाऊ जी, इन बड़े बड़े बंगलों में कौन रहता है? क्या कभी हम जैसे लोग इनमें रह सकते हैं?”
पिता ने उससे कहा था, “बेटा, इनमें हमारे जैसे लोग ही रहते हैं। उनमें और हम में फर्क बस इतना है कि उनमें से अधिकतर लोग पढ़े-लिखे होते हैं। पढ़ाई-लिखाई के बूते पर तुम बड़ी से बड़ी नियामत हासिल कर सकती हो।”
पिता का यह जवाब सुन कर वह हैरत से भर गयी थी और उसने फिर से पिता से सवाल किया, “बाऊ जी, अगर मैं खूब मन लगा कर पढ़ाई करूं तो क्या मैं कभी ऐसा घर खरीद पाऊँगी?”
“बिलकुल खरीद पाओगी, शर्त बस एक ही है, तुम्हें हर क्लास में बहुत अच्छा नतीजा लाना होगा।”
उसने उसी दिन पिता का दिया वह गुरु मन्त्र गाँठ बाँध लिया और मन ही मन ठान लिया था कि अब से वह पढ़ाई में बहुत कड़ी मेहनत करेगी।
शगुन शुरू से सरकारी स्कूल में पढ़ती आ रही थी। पढ़ाई में ठीक-ठाक थी। सातवीं तक तो वह किसी तरह अपनी कड़ी मेहनत, शिक्षकों के सहयोग और प्रोत्साहन से समौसे बनाने के साथ-साथ अपनी पढ़ाई बहुत अच्छे ढंग से मैनेज कर रही थी, लेकिन आठवीं कक्षा में आने के बाद पढ़ाई के लिए अधिक समय की जरूरत होती, सो अब माँ ने खाना बनाने के कई घर छोड़ दिए थे और वो समौसे बनाया करतीं।
शगुन अब जी जान लगा कर पढाई करती। उसने अपनी ज़िंदगी का मकसद बना लिया था कि वो एक दिन अपने माता-पिता को वो सारी खुशियाँ देगी जो उनके लिए सपना भर थीं।
स्कूल में ही उसे अपने शिक्षक-शिक्षिकाओं द्वारा होटल मैनेजमेंट में डिग्री के बारे में पता चला। खाना पकाने में अपने महारथ के चलते वह बारहवीं के बाद होटल मैनेजमेंट की पढाई करने के सपने देखने लगी।
वक़्त की उड़ान के साथ उसने बारहवीं कक्षा सत्तर प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उसे जयपुर स्थित एक होटल मैनेजमेंट संस्थान में दाखिला मिल गया।
अब वह थी और उसका ख्वाब था, पढाई पूरी कर किसी प्रतिष्ठित होटल में नौकरी पाने का।
नीयत वक़्त पर उसे होटल मैनेजमेंट में बैचलर की डिग्री मिली। उसने कुकिंग में अपनी दक्षता के दम पर पूरे कॉलेज में टॉप किया और फिर उसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।
फिर उसने पोस्ट ग्रैजुएशन किया और जयपुर के ही एक प्रतिष्ठित होटल में अच्छी सैलरी पर नौकरी मिल गई।
ज़िंदगी नियत ढर्रे पर आ चली थी।

धीरे-धीरे वक़्त के साथ शगुन ने किराए के घर में सारे सुख-साधन जुटा लिए। फ्रिज़, टीवी, माइक्रोवेव, फर्नीचर, गाड़ी, सब खरीद लिए।
नौकरी करते हुए कुछ बरस बीत गए। उसने नया घर भी खरीद लिया। आज उसका गृह प्रवेश था।
तभी कॉलोनी में गश्त लगाते चौकीदार की अपना डंडा ठकठकाते हुए जागते रहो की हुंकार से वह वर्तमान में वापस आई।
उसने आँखें मूँद सोने की भरसक कोशिश की। कुछ ही देर में वह सुकून भरी नींद के आगोश में समा गयी।
वक़्त का पंछी उड़ान भरता गया था।
अपने नए घर में आये उसे पूरा एक बरस हो चला।
माता-पिता उसकी तरक्की देख बेहद मगन थे। उसे दुआएँ देते नहीं थकते।
दोनों प्राणी बस दिन-रात एक ही बात की रट लगाए रहते, “बेटा, कोई अच्छा सा लड़का देख कर हमें बता दे। लड़का किसी भी जाति-बिरादरी का हो, हम कोई अड़ंगा नहीं डालेंगे। खुशी-खुशी तेरी शादी कर देंगे। तूने हमारी सारी हसरतें पूरी कर दीं। हमें और कुछ नहीं चाहिए।”

एक दिन माँ ने शगुन से कहा, “बेटा, तू मानिक से शादी कर ले। वो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मेरा मन कहता है, वो तुझे बहुत सुखी रखेगा।”शगुन ने माँ को कोई जवाब नहीं दिया और खामोश रह गयी। शगुन की ज़िंदगी में मानिक कॉलेज के दिनों में आया था। वो एक ऊंचे, इज़्ज़तदार खानदान का इकलौता चिराग था। दोनों ने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई एक ही संस्थान में साथ-साथ की। संयोग से दोनों की नौकरी भी एक ही होटल में लगी। सो धीमे-धीमे दोनों की दोस्ती आगे बढ़ी। मानिक उस पर कॉलेज के दिनों से दिल-ओ-जान से फ़िदा था। आये दिन उससे अपनी मोहब्बत का इज़हार करता, लेकिन शगुन उसे गंभीरता से नहीं लेती। मजाक में उड़ा देती।
न जाने क्यों, शगुन उसके साथ रिश्ते में कोरी दोस्ती से आगे कुछ सोच ही नहीं पाती। वह अपना मानस ही नहीं बना पाई थी कि उसे मानिक के साथ विवाह कर के सेटल हो जाना चाहिए। जब भी माँ और बाऊ जी उससे विवाह करने का इसरार करते, उसे लगता कि अभी वह मानसिक तौर पर किसी को अपनी ज़िंदगी में शामिल करने के लिए तैयार नहीं है।
उसका मानिक से विवाह के बारे में इस कोण से सोचने की एक वज़ह भी थी। उसे मानिक का अपने प्रति रवैया बेहद तानाशाही भरा लगता।
उसके साथ कई बार कुछ ऐसा घट चुका था जो उसकी इस धारणा को मजबूती से पुष्ट करता।
मसलन वह जब भी कोई महत्वपूर्ण अथवा मामूली बात के सन्दर्भ में ऐसा निर्णय लेता, जो शगुन से संबंधित होती, वह उससे उसकी राय लेना कतई जरूरी नहीं समझता। अक्सर उस पर अपना फैसला थोपने की कोशिश करता, और यह बात उसे खासी नागवार गुजरती।
पिछले महीने ही तो वह शगुन के घर आया हुआ था और माँ और बाऊ जी से बातचीत करते वक़्त उसकी शादी की बात छिड़ गयी थी। तभी उसने ख़ट से बाऊ जी से कह दिया, “अंकल जी, मैं शगुन से शादी करना चाहता हूँ। अब आप बताइये, मैं अपने पेरेंट्स को आपके घर कब लाऊँ?”
शगुन को मानिक की यह बात बहुत गहरी चुभी थी और वह बेहद आहत महसूस कर रही थी। उस वक़्त तो उसने माँ और बाऊ जी के सामने मानिक से कुछ नहीं कहा लेकिन उसने अकेले में उसकी खबर ली, यह कहते हुए कि “तुमने हम दोनों की शादी जैसे अहम् मुद्दे पर मेरी राय लेना जरूरी नहीं समझा और माँ-बाऊ जी को अपना फैसला सुना दिया। अब तो मैं तुमसे शादी कतई नहीं करूंगी, न आज न कल। तो अब तुम्हें खुद बाऊ जी से कहना होगा कि अभी हमारी शादी नहीं हो रही, और तुम अपने पेरेंट्स को अभी उनसे मिलाने के लिए नहीं ला रहे।
और हाँ, एक बात कान खोल कर सुन लो, मुझे तुम्हारी यह हिटलरी सख्त नापसंद है। ये तुमसे नहीं छूटने वाली न ही मुझसे बर्दाश्त होने वाली। लौंग रन में तुम्हारी यह आदत हमारे बीच घोर टकराव पैदा करेगी। सो बेहतर होगा कि हम अपने रास्ते अभी से अलग कर लें और महज दोस्त बने रहें। मियाँ बीवी बन कर तो हम हमेशा झगड़ते ही रहेंगे।”
शगुन की यह बात सुन कर मानिक का चेहरा उतर गया था। उसे एहसास हुआ, कि इस बार उससे बहुत भारी गलती हो गयी थी। उसने शगुन को भरसक मनाने की कोशिश की यह कहते हुए कि, “कसम खाता हूँ, अब से मैं हर बात में अपना निर्णय लेने से पहले तुमसे डिस्कस अवश्य करूँगा। सॉरी, वेरी सॉरी। प्रॉमिस, आइन्दा तुम्हें मुझसे ऐसी कोई शिकायत नहीं होगी।”
मानिक ने शगुन को मनाने की लाख कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी। अतः विवश मानिक को शगुन के पिता को फ़ोन करके कहना पड़ा कि उसके पिता की तबियत खराब होने की वज़ह से वे उनके यहाँ पूर्व निर्धारित दिन नहीं आ पायेंगे।
मानिक येन केन प्रकारेण रूठी हुई प्रिया को मनाने में लगा हुआ था लेकिन शगुन मानिक की ओर से आश्वस्त नहीं हो पा रही थी कि विवाह के बाद मानिक की उसे फॉर ग्रांटेड लेने की आदत में कोई बदलाव आ पायेगा सो उसने उससे अपनी शादी के बारे में सोचना छोड़ दिया था।
दिन यूँ ही गुज़रते जा रहे थे। उस दिन शगुन दूसरे दूरस्थ शहर में स्थित होटल की मुख्य शाखा में एक सेमीनार अटेंड करने गई हुई थी।
इधर उसके पिता को अचानक दोपहर में हार्ट अटैक आ गया। दोनों माता-पिता अकेले थे उस वक़्त। पिता सीना हाथों से थामे तेज दर्द में तड़प रहे थे। माँ ने फ़ौरन शगुन को फ़ोन लगाया, लेकिन शगुन का फ़ोन सायलेंट मोड में था। माँ ने दो-तीन घनिष्ठ परिचितों को भी फ़ोन लगाया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। फिर माँ ने मानिक को फोन लगाया और उसे जल्दी से जल्दी घर आने के लिए कहा।
मानिक ने उनके घर के पास वाले बढ़िया अस्पताल को फोन कर शगुन के पते पर महज़ दस मिनटों में एम्बुलेंस भेज दी और खुद अस्पताल पहुँच शगुन के पिता को अस्पताल में भर्ती करने की सारी औपचारिकताएं पूरी कर दीं। शगुन के पिता के हॉस्पीटल पहुँचते ही उनका इलाज शुरू हो गया।
शगुन अगले दिन शाम तक फ़्लाईट से घर पहुँची। उसकी अनुपस्थिति में मानिक ने खड़े पैरों अस्पताल की सारी व्यवस्था संभाल ली थी। उसने शगुन के पिता के इलाज के बिलों का खुद एडवांस में भुगतान कर उनका बढ़िया से बढ़िया इलाज करवाया।
इधर मानिक को इतनी प्रतिबद्धता से पिता के ट्रीटमेंट की सारी व्यवस्था संभालते देख उससे रूठी शगुन का गुस्सा तनिक शांत हो गया था और वह उसके प्रति कृतज्ञ भाव से भर उठी।
समय पर ट्रीटमेंट मिलने से उनकी जान बच गई और कुछ ही दिनों में वे घर लौट आए।
आज संडे है। शाम को मानिक उसके घर आया। माँ के हाथों की चाय पीते हुए शगुन ने मानिक से कहा, “मानिक, तुम्हारा किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूं? तुमने बाऊ जी की जान बचा कर मुझ पर जो क़र्ज़ चढ़ाया है, वो मैं ताज़िंदगी अदा नहीं कर पाऊँगी। थैंक्स सो सो सो मच,” कहते हुए उसने मानिक द्वारा पिता पर खर्च की गयी लाखों की रकम का चेक उसे थमा दिया।
चेक देख उसे वापस शगुन को देते हुए मानिक शगुन से बोला, “ये चेक देकर तुम मुझे शर्मिंदा कर रही हो। क्या तुम्हारे बाऊ जी मेरे बाऊ जी नहीं? मैं ये चेक हरगिज़-हरगिज़ नहीं लूंगा।”
इस पर शगुन ने उससे कहा, “मानिक, दोस्ती अपनी जगह है और पैसा अपनी जगह। तुमने शायद सुना भी होगा, दोस्ती के बीच पैसा कभी नहीं आना चाहिए। तुम इसे नहीं लोगे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा। मैं तुम्हारे इस क़र्ज़ के साथ आसानी से जी नहीं पाऊँगी। प्लीज़ यह रख लो।”
“क्या तुम्हारे बाऊ जी मेरे बाऊ जी नहीं? एक बात बताओ, अगर मेरी जगह तुम होती तो क्या तुम मुझ से रुपये ले लेती? प्लीज़ शगुन, मेरी अंतरात्मा बहुत दुःख पायेगी, अगर मैंने तुमसे ये चेक ले लिया। समझा करो यार, हमारी दोस्ती इस लेन-देन से बहुत आगे निकल चुकी है। लो चलो, मैं ये किस्सा ही ख़तम कर देता हूँ,” कहते हुए मानिक ने चेक फाड़ दिया। फिर मुस्कुराते हुए उससे बोला, “तुम्हें अगर मेरा क़र्ज़ उतारना ही है तो प्लीज़ मुझ से शादी के लिए हामी भर दो। बोलो, बरात कब लाऊँ?”
मानिक की ये बात सुन शगुन ने मुस्कुराते हुए उससे कहा, “बरात? उसकी तो बात ही मत करो। सीरियसली, हम शादी कर भी लें तो मेरी तुम्हारी नहीं पटने वाली। तो इस बात को हमेशा के लिए भूल जाओ।”
“प्लीज़ यार… इतनी हार्टलेस तो मत बनो। मैं कुँवारा ही मर जाऊंगा अगर तुमने आज अभी इसके लिए हाँ नहीं की।”
“अच्छा, अच्छा, देखते हैं, वो भी सोचेंगे।” शगुन ने अपनी पलकें झपकाते हुए, होंठों पर मीठी सलज्ज मुस्कान के साथ उससे कहा।
“तो मेरी मैरिज पेटीशन अंडर कंसीडरेशन है? चलो यार, अभी के लिए इतना ही काफी है, इस भरोसे पर ही कुछ दिन और जी लूंगा,” कहते हुए मानिक ने मुदित मन जोर का ठहाका लगाया।
फ़िज़ा खुशनुमा उम्मीदों से गुलज़ार हो उठी।
