
सुप्रसन्ना
स्वतंत्रता की रागिनी
मधुर-मधुर रस घोल रही,
हिमगिरि से सागर तक
भारत-गाथा बोल रही।
स्वर्णिम भोर के संग-संग
नव आशा मुस्काती है,
तिरंगे की हर एक लहर
गौरव-गान सुनाती है।
खेतों में हरियाली गाती,
नदियाँ कल-कल गान करें,
नील गगन में उड़ते पंछी
मधुर स्वर में अभिनंदन करें।
जन-जन के उर में बसती
यह अनुपम अभिरामिनी,
युग-युग तक गूँजित रहे
स्वतंत्रता की रागिनी।
मातृभूमि के चरणों में
श्रद्धा के सुमन खिलें,
भारत की यश-कीर्ति के
दीप सदा अविरल जलें।
स्वतंत्रता की रागिनी
जय का मंगल गान करे,
विश्व-पटल पर भारत का
नित्य नवोदय मान करे।
