Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

हरसिंगार धरा पर बिखर गई

धरा पर बिखरे हरसिंगार के फूल धरा पर बिखरे हरसिंगार के फूल

सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

काश! कहीं कोई ऐसा हो,
जो बनकर आधार सँभाले,
थककर जब यह जीवन बिखरे,
मौन स्नेह से गले लगा ले।

रजनी भर महकी पारिजात,
सुरभि-सुधा जग में बिखराई,
भोर हुई, थक-टूटी कलिका,
सुध लेने स्वर्णिम भोर आई।

धरणी-सी मिले पावन आश्रय,
तो जीवन को विश्राम मिले,
साँसों की इस सुरभित महक को,
धरा-धाम-सी छाँव मिले।

शाखा से छूटना अंत नहीं है,
समर्पण का यह रूप नया,
झरना पारिजात का सार्थक,
अवनी से लिपटी उसकी हया।

विश्वास दृढ़ है हरसिंगार का,
धरा तो अंक लगाएगी,
पारिजात की पावन महक को,
हर हृदय तक पहुँचाएगी।

हरसिंगार धरा पर बिखर गई,
लिपट अवनी से निखर गई।
इन रचनाओं को भी पढ़ें-
SIR के बीच मतदाता का भरोसा
अंतर्मन
वह एक पल
हमाम के नंगे
माँ-बेटी का नाता
अन्याय का समर
चलते-चलते
तुम वही हो?
हरसिंगार धरा पर बिखर गई
आबू रोड में जुटेंगे 300 से अधिक कवि

5 thoughts on “हरसिंगार धरा पर बिखर गई”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *