
प्रतिभा इंदु
चलते-चलते हम दोनों को जुदा एक दिन हो जाना है,
दिल में जो आए, समझो, बस मन को यही समझाना है।
अपने और पराए देखे, देख लिया है रिश्ता-नाता,
मतलब वालों की दुनिया में, घुट-घुटकर मर जाना है।
सपनों के सौदागर बनकर, छलने वाले बहुत मिलेंगे,
गीत सुमंगल गाते, मिल-जुलकर सरिता बनकर बह जाना है।
गिरगिट जैसा रंग बदलना, हुआ कभी न हो पाएगा,
मधुरिम जीवन हो जाए, नूतन प्रतिभा बिखराना है।
मौसम-सा बदलाव तुम्हारा, फिर भी मैंने ठान लिया,
पल-पल अंतर-नेह लुटा, प्रिय, सुधा-धार बन जाना है।
नील व्योम के पार नहीं, कोई जाकर लौट सकेगा,
अंतरिक्ष में उड़ लो जी भर, धरती पर फिर आ जाना है।
