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अंतर्मन

निर्मल अंतर्मन और आत्मिक प्रेम को दर्शाती हिंदी कविता सच्चा प्रेम बाहरी सौंदर्य से आगे बढ़कर इंसान के निर्मल अंतर्मन को पहचानता है।

डॉ. मंजूलता, नोएडा

अंतर्मन
नहीं देखता तुम्हारा
मुखमंडल,
सोने-सा दमकता,
न ही उभरे हुए वक्षस्थल,
न ही कटि-प्रदेश,
न ही घने लहराते केशों को।

नहीं देखना मुझे है
महावर लगे,
पायल से सुशोभित पाँव,
न ही नख-से-सिर तक का श्रृंगार।

मैं तो झाँकता हूँ
तुम्हारे अंतर्मन को,
जो श्वेत, कोरा और
बेदाग है,
जिसमें ढूँढ़ने पर भी
मैल न मिले।

तेरी यही अच्छाई
मुझे तेरी ओर खींच
ले जाती है
तेरा सान्निध्य पा, मैं
भी तर जाऊँगा।

6 thoughts on “अंतर्मन”

  1. ” मैं तो झाँकता हूँ
    तुम्हारे अंतर्मन को,
    जो श्वेत, कोरा और
    बेदाग है,
    जिसमें ढूँढ़ने पर भी
    मैल न मिले। ”
    भगवान हर इंसान को जन्म से एसा ही अपना प्रतिरूप बनाता है । इसमें हम मिलावट कर देते हैं गैरज़रूरी इच्छाओं की । खुद अपने लक्ष्यों को सात्विक बनाना चाहिए। हमारी खुशी हमारे पास भागकर आएगी

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