
डॉ. मंजूलता, नोएडा
अंतर्मन
नहीं देखता तुम्हारा
मुखमंडल,
सोने-सा दमकता,
न ही उभरे हुए वक्षस्थल,
न ही कटि-प्रदेश,
न ही घने लहराते केशों को।
नहीं देखना मुझे है
महावर लगे,
पायल से सुशोभित पाँव,
न ही नख-से-सिर तक का श्रृंगार।
मैं तो झाँकता हूँ
तुम्हारे अंतर्मन को,
जो श्वेत, कोरा और
बेदाग है,
जिसमें ढूँढ़ने पर भी
मैल न मिले।
तेरी यही अच्छाई
मुझे तेरी ओर खींच
ले जाती है
तेरा सान्निध्य पा, मैं
भी तर जाऊँगा।
