
प्रतिमा दीक्षित “अप्रतिम” कानपुर (यूपी)
मुझे भूल जाने की आदत नहीं है
मुझे तुम भुलाने की कोशिश न करना
ये आंखे तुम्हे देख रोने लगेंगी
बिना बोले सब कुछ कहने लगेंगी
बचोगे भला तुम कैसे नज़र से
मेरी तो नज़र ही बुलाने लगेगी
न रखो कोई गर रिश्ता जो हमसे
फ़िर ये दिखने की कोशिश न करना
मुझे तुम भुलाने की कोशिश न करना
कांटो से छलनी राहें मिली थी
हमें तो मुहब्बत में आहें मिली थी
ये दिल टूटा लेकिन कई बार जोड़ा
दिखावे की हमको बाहें मिली थी
मझधार छोड़ा,न मुड़कर निहारा
अब रिश्ता बचाने की कोशिश न करना
मुझे तुम भुलाने की कोशिश न करना
प्रतिमा हूं मै पर बसी आत्मा है
मेरी रूह का तुझसे रहा वास्ता है
मुझे गौर से तुम इक बार देखो
जिंदा हूं मै,ये लेकिन सज़ा है
बिछड़ हम गए तेरे मन का हुआ है
मोहब्बत जताने की कोशिश न करना
मुझे तुम भुलाने की कोशिश न करना
