एक पाती मुसाफ़िर के नाम…
जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।

जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।
यह पाठ जीवन की कठिनाइयों और नैतिक संघर्षों का दर्पण है। यह बताता है कि सही और अच्छा बने रहना जितना सुनने में आसान लगता है, वास्तविकता में उतना ही कठिन है। चाहे परिवार और अपनों के साथ संबंध हों या समाज की अपेक्षाएँ, हमेशा सत्य और अच्छाई के मार्ग पर चलना चुनौतीपूर्ण होता है। लेखक अपने भीतर और बाहरी दुनिया में छिपे संघर्षों को उजागर करता है—अपने अंदर के रावण को पहचानना और उसे नियंत्रित करना, सही और गलत के बीच अंतर समझना, और स्वार्थी दुनिया में सच्चे और अच्छे लोगों की तलाश करना। यह न केवल व्यक्तिगत जुझारूपन का वर्णन है, बल्कि समाज और मनुष्य के अंतर्मन की जटिलताओं की भी गहरी झलक देता है।
अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।
श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।