मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

मधु झुनझुनवाला अमृता, जयपुर

अँखियाँ जगती रही प्रीत स्वप्न लिए,
रात ठहरी रही भोर की प्रतिक्षा लिए ।

ओढ़ कर मौन पीर मानिनि-सी सो रही,
कौन बूझे वेदनाएँ वो पी गरल चुप रही ।

भावनाओं के शुभ्र पारिजात बिखेर कर,
चली श्वेताम्बरा सुरभित यामिनी छोड़ कर।

घिरे श्यामल मेघ दीपशिखा मद्धम हुई,
झरती रही चाँदनी अमावस सक्षम हुई।

नीहार बिंदुओं सा था जिसका अंतर्मन,
माधुरिमा बही लेखनी में खिले हिय सुमन।

2 thoughts on “मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

  1. धन्यवाद सुरेश जी रचना पोस्ट करने के लिए 🙏🏻

  2. बहुत सटीक पीड़ा का चित्रण किया है मधु जी ।
    रचनाकार बहुत कठिनाईयों को पार कर , अकेलेपन का गरल पचाकर तब सच्चाई को उकेर पाता है ।
    पढ़ने वालों का अंतर्मन छूने वाली रचना का स्वागत ।
    धन्यवाद ।

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