मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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चांद में दाग

चाँद में दाग़ जरूर होता है, लेकिन मानव भी कभी पूर्ण नहीं होता। कमियाँ सभी में होती हैं, फिर भी केवल चाँद ही बदनाम माना जाता है। उसकी खूबसूरती, गुण और चाँदनी की रौशनी, अंधेरे को काट देने की क्षमता, पूर्णमासी की छटा—सब कुछ अद्भुत है। अमावस की रात को उसकी कमी महसूस होती है, लेकिन आसमान में उसकी सुंदरता और प्यारा प्रभाव सबको भाता है। अक्सर लोग केवल दोष देखते हैं, जबकि अगर हम अपने गिरेबान में झाँकें, तो पता चलता है कि हमारी खुद की कमियाँ भी उतनी ही स्पष्ट हैं।

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