
प्रीति अरोरा “प्रीत” बदायूं (उत्तर प्रदेश)
रण-संग्राम की धरा पर, दे अन्याय को चीर,
देख ज़रा अंतस-चक्षु से, आत्मा बहा रही है नीर।
शस्त्रों का आलिंगन कर तू, शौर्य-तिलक लगा ले माथ,
आज नहीं जागा तो मानव, कल पश्चात्ताप होगा साथ।
धधक रही माँ-बेटी की इज़्ज़त, कैसे चुप रह सकता है?
अन्यायों से भरा घड़ा तू, कैसे मस्तक धर सकता है?
पल-पल रिसता न्याय भी, धोखा हुआ अति बलवान,
भरी सभा भी मौन को वरती, जब शकुनी चलता चाल।
कुर्सी पर बैठे अभिमानी, क्यों न करते उक्त संवाद?
लेखक भी चुप क्यों है, बोलो, क्या कलम ठहर गई आज?
अपने-अपने स्वार्थ की खातिर, मानवता बिकती बाज़ार,
लौह-सम करकश व्यंग्य-बाण से, फिर सजा हुआ है हाट।
सत्ताधारी शासन में सब, मिला रहे सुर में ताल,
अपने मत की कोई न कीमत, बस तलवे रहे हैं चाट।
मौन रहा जो अब तू मानव, तो समय बड़ा बलवान,
कर्तव्यों से विमुख हुआ तो, समय-चक्र से सीधा संवाद।
