मतदाता का नाम, Form 6 और SIR: आखिर भरोसा किस पर करे नागरिक?

निमिषा सिंह, स्वतंत्र पत्रकार
मतदाता सूची में अपना नाम देखना किसी नागरिक के लिए महज एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। यह उसके उस अधिकार की पहली सीढ़ी है, जिसके जरिए वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या उसमें संशोधन की प्रक्रिया जितनी साफ और पारदर्शी होगी, चुनाव व्यवस्था पर नागरिक का भरोसा भी उतना ही मजबूत रहेगा।
इसी संदर्भ में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और Form 6 को लेकर चल रहा विवाद महत्वपूर्ण हो जाता है। मामला अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं है। चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया, आयोग के भीतर सामने आई कथित असहमतियां, Form 6 के साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणा-पत्र और इन सब पर उठे राजनीतिक सवालों ने चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता को बहस के केंद्र में ला दिया है।
विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठा रहा है। प्रदर्शन हो रहे हैं। भाजपा और केंद्र सरकार विपक्ष के आरोपों का जवाब दे रहे हैं और चुनाव आयोग के बचाव में भी सामने आ रहे हैं। इसी बीच मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच गया है। 29 सितंबर को अदालत ने चुनाव आयोग के कामकाज और SIR से जुड़े सवालों वाली याचिका को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी। याचिका में आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। अब इस मामले में अदालत की सुनवाई का इंतजार है।
विपक्ष का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। चुनाव आयोग दूसरी तरफ कहता रहा है कि मतदाता सूची को अद्यतन रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं मौजूद हैं। इन दोनों दावों के बीच असली सवाल यह है कि प्रक्रिया जमीन पर कितनी पारदर्शी और नागरिक के लिए कितनी सुरक्षित है। किसी मतदाता का नाम सूची से हटना कोई सामान्य प्रशासनिक घटना नहीं है। उसके पीछे मतदान का अधिकार जुड़ा है। इसलिए नाम हटाने का कारण स्पष्ट होना चाहिए, संबंधित व्यक्ति को जानकारी मिलनी चाहिए और आपत्ति तथा अपील का पर्याप्त अवसर होना चाहिए।
इस विवाद को और गंभीर बनाने वाली बात चुनाव आयोग के भीतर कथित असहमतियों की खबरें हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर 14 बार आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में SIR और उससे जुड़े कई फैसलों का उल्लेख किया गया। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने कहा कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
यहां किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दोनों बातों को समझना जरूरी है। किसी संस्थान में असहमति होना असामान्य नहीं है। लेकिन अगर आपत्तियां दर्ज हुई हैं, तो यह जानना भी जरूरी है कि वे किन मुद्दों पर थीं, उनका जवाब क्या दिया गया और अंतिम निर्णय किस आधार पर लिया गया। संबंधित रिकॉर्ड सामने आएं तो विवाद का बड़ा हिस्सा खुद ही खत्म हो सकता है। लोकतंत्र में असहमति समस्या नहीं है, लेकिन असहमति को लेकर अस्पष्टता समस्या बन सकती है।
Form 6 का विवाद भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। SIR के दौरान Form 6 के साथ अतिरिक्त घोषणा-पत्र (Annexure D) जोड़े जाने पर सवाल उठे। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मूल Form 6 में बदलाव नहीं किया गया और SIR से जुड़ी घोषणा अलग रखी गई थी। लेकिन इस व्यवस्था पर आयोग के भीतर भी आपत्तियां सामने आईं।
अब 30 सितंबर को आयोग ने उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में Form 6 से यह अतिरिक्त SIR घोषणा-पत्र हटा दिया है, जहां SIR पूरा हो चुका है। वहां नए मतदाता सामान्य Form 6 के जरिए नाम दर्ज करा सकेंगे। हालांकि जहां SIR अभी जारी है, वहां यह घोषणा-पत्र लागू रहेगा।
यह बदलाव कई सवाल छोड़ता है। शुरुआत में यह अतिरिक्त व्यवस्था क्यों लाई गई? इसका प्रशासनिक और कानूनी आधार क्या था? अगर यह केवल SIR की अवधि तक जरूरी थी, तो पहले इतनी स्पष्टता क्यों नहीं थी? और यदि आयोग के भीतर इस पर आपत्तियां थीं, तो उन आपत्तियों और उनके निपटारे का रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों न किया जाए? इन सवालों का स्पष्ट जवाब चुनाव आयोग की विश्वसनीयता के हित में भी जरूरी है।
यहीं से केंद्र सरकार और भाजपा की भूमिका भी चर्चा में आती है। जब विपक्ष चुनाव आयोग पर सवाल उठाता है, भाजपा की तरफ से कहा जाता है कि विपक्ष संवैधानिक संस्था की छवि खराब कर रहा है। लेकिन लोकतंत्र में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि सरकार की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। क्या सरकार को चुनाव आयोग का राजनीतिक बचाव करना चाहिए या यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आयोग अपने हर निर्णय का जवाब दस्तावेजों और नियमों के आधार पर दे?
अगर विपक्ष का आरोप गलत है तो चुनाव आयोग के पास उसे तथ्यों के साथ खारिज करने के पर्याप्त साधन होने चाहिए। सरकार को हर सवाल का राजनीतिक जवाब देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। और अगर प्रक्रिया में कहीं कमी है तो उसे स्वीकार करना भी संस्था की कमजोरी नहीं है। इसलिए सरकार से सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि वह चुनाव आयोग के पक्ष में क्यों बोल रही है। सवाल यह भी होना चाहिए कि वह आयोग को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए क्या कर रही है।
इस पूरे विवाद को भाजपा बनाम कांग्रेस, सरकार बनाम विपक्ष या मोदी सरकार बनाम चुनाव आयोग के रूप में देखना आसान है। लेकिन असली केंद्र में है मतदाता। वह नागरिक जिसे यह जानना है कि मतदाता सूची में उसका नाम है या नहीं, अगर कोई गलती हुई तो वह उसे ठीक करा सकता है या नहीं और मतदान के दिन उसकी आवाज व्यवस्था में दर्ज होगी या नहीं।
इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि किसकी प्रेस कॉन्फ्रेंस ज्यादा प्रभावी रही। सवाल यह है कि चुनाव आयोग अपने ऊपर उठे सवालों का कितना स्पष्ट जवाब देता है। सरकार से भी सवाल यही है—क्या वह आयोग की राजनीतिक ढाल बनेगी, या ऐसी पारदर्शिता की मांग करेगी जिससे आयोग को किसी राजनीतिक ढाल की जरूरत ही न पड़े? विपक्ष से भी सवाल है—अगर आरोप गंभीर हैं तो क्या उनके साथ पर्याप्त दस्तावेज और प्रमाण सामने रखे जाएंगे? और मीडिया से भी सवाल है—क्या वह दोनों पक्षों के दावों के बीच जाकर सच की पड़ताल करेगा?
चुनाव आयोग के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती किसी राजनीतिक दल को संतुष्ट करना नहीं है। उसे उस नागरिक को आश्वस्त करना है जो अपना वोट डालते समय किसी पार्टी पर नहीं, व्यवस्था पर भरोसा करता है। सरकारें बदलती हैं। सत्ता के समीकरण बदलते हैं। राजनीतिक आरोप भी बदलते रहते हैं। लेकिन चुनाव की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ जाए, तो उसकी कीमत लंबे समय तक चुकानी पड़ सकती है। इसलिए SIR और Form 6 की मौजूदा बहस को किसी एक दल की जीत या हार के रूप में देखने के बजाय उस बड़े सवाल के रूप में देखना चाहिए जो हर चुनाव से पहले हमारे सामने आता है—क्या मतदाता को अपनी चुनावी व्यवस्था पर भरोसा है?
