
प्रतिभा पांडेय “प्रति”
जब भी समय मिलता है,
पढ़ लेती हूँ तुमको,
उर के भाव से लेकर
प्रेम के अभाव तक,
मिलन की उत्कंठा से लेकर
देखने की बेचैनी तक,
गगनचुंबी सपनों से लेकर
साथ बचे अपनों तक,
शब्द की उफनती धारा से लेकर
चिरस्थायी मौन तक।
तुम हो एक, पर दिखते अनेक हो,
हृदय से चंचल, पर मन के नेक हो,
संभलकर खुद को सँभाल लेते हो,
सतरंगी सपनों से खुद को सजाते हो,
सुनाना चाहते हो, सुनना चाहते हो,
कुछ खट्टे-मीठे पलों को जीना चाहते हो।
कोई तुम्हें दिल से समझता है, तो
कोई नासमझ होने का नाटक करता है,
कोई तुम्हें गले लगाता है, तो
कोई झूठ को गाता है,
पर किसी की बात से
क्या ही फ़र्क पड़ता है,
तुम वह हो, जो तुम बनना चाहते हो,
इसलिए सबसे पहले खुद को भाते हो…!
