Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

आज़ादी का सच

Image Alt Text: स्वतंत्रता दिवस के जश्न के बीच आम आदमी की जिंदगी और सामाजिक विडंबना दर्शाती हिंदी कविता

प्राची मिश्रा

लोगों ने बताया तुम आज़ाद हो
बहुत खुशी हुई
मिठाइयाँ बाँटी गईं
गान गाये गए
कुछ लोग भाषण देने लगे
आज़ादी कैसे मिली
किसने दिलाई
फिर उजले कपड़े की क्रीज़ संभालते हम घर आये
हाथ में आधा लड्डू
जो हाथ में पकड़े-पकड़े सिलसिला सा गया था
छोटे भाई के हाथ पर रख दिया
फिर वही दिन जो कल था
माँ रसोई से चिल्लाकर बोलीं
आकर खाना खा लो
फिर जाकर बाहर के काम देखूँ
मुझे तो एक दिन की छुट्टी नहीं
एक निवाला भीतर गया कि पड़ोस में
किसी की चीख सीना चीर गई
पड़ोसी की बेटी
ससुराल में खाना बनाते जल मरी
बगल के छोटे से स्कूल के बिगुल में बजता
“ये देश है वीर जवानों का”
धीमा हो गया
भीड़ जमा हुई और खाली हो गई
कोई रोया, किसी ने कहा “चरित्रहीन थी”
सब घर लौटे
बाबा और दादी के कमरे में टीवी चलता रहा
लेकिन दोनों बातों में मशगूल थे
पड़ोसी की बेटी और पड़ोसी..
टीवी का स्वर बाहर तक आता रहा “महंगाई की मार, हाहाकार”
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई
रतिराम था बाबा के ऑफिस का चपरासी
“बाबूजी पेंशन के कागज़ नहीं बन पा रहे”
चप्पल घिस गई
बाबू बस हाथ रगड़ के कहता है “समझो”
दादी कमरे से चिल्लाईं
चाय चढ़ा दो
और एक सब्ज़ी और बना लेना
भाई हाथ में तिरंगा लिए यहाँ से वहाँ दौड़ता रहा…
पिताजी चिल्लाये “पढ़ लो वरना सारी ज़िन्दगी दौड़ते ही रहोगे”
रात हो गई थी
नई सुबह की तैयारी थी….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *