युद्ध की समझ…
युद्ध कोई नहीं चाहता, फिर भी इतिहास गवाह है कि कई बार परिस्थितियाँ और अन्याय ऐसे मोड़ पर ले आते हैं, जहाँ संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। यह कविता युद्ध के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उसकी समझ विकसित करने का प्रयास है।

युद्ध कोई नहीं चाहता, फिर भी इतिहास गवाह है कि कई बार परिस्थितियाँ और अन्याय ऐसे मोड़ पर ले आते हैं, जहाँ संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। यह कविता युद्ध के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उसकी समझ विकसित करने का प्रयास है।
यह कविता धुएँ को एक दैत्याकार शक्ति के रूप में चित्रित करती है, जो युद्ध, बम, मिसाइलों और आग से जन्म लेकर पूरे वातावरण को विषाक्त कर देना चाहती है। यह केवल प्रदूषण की नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आत्मविनाश की कहानी भी है।
युद्ध की विभीषिका” एक ऐसी प्रभावशाली हिंदी कविता है, जो युद्ध की भयावहता और उसके मानवीय दुष्परिणामों को गहराई से उजागर करती है। यह कविता केवल युद्ध के बाहरी विनाश को नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी पीड़ा, अपराधबोध और इंसानियत की आवाज़ को सामने लाती है।