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युद्ध के बाद ध्वस्त शहर में मलबे के बीच खेलते बच्चे और क्षितिज पर उगती आशा की किरण, जो शांति और मानवता का प्रतीक है।

मैं जानता हूँ, फिर भी…

‘मैं जानता हूँ, फिर भी…’ एक विचारोत्तेजक मुक्तछंद कविता है, जो युद्ध की भयावहता, निर्दोष लोगों की पीड़ा, युद्ध-विराम की राहत और मानवता की अमर जिजीविषा को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। यह कविता विनाश के बीच भी उम्मीद और शांति के महत्व को रेखांकित करती है।

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युद्ध और उसके परिणामों पर चिंतन को दर्शाता एक प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें धुएँ और विनाश के बीच खड़ा एक अकेला व्यक्ति संघर्ष और मानवता पर विचार कर रहा है।

युद्ध की समझ…

युद्ध कोई नहीं चाहता, फिर भी इतिहास गवाह है कि कई बार परिस्थितियाँ और अन्याय ऐसे मोड़ पर ले आते हैं, जहाँ संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है। यह कविता युद्ध के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि उसकी समझ विकसित करने का प्रयास है।

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पेड़ की छांव में बैठी महिला स्कूल परिसर में लिख रही है, आसपास खेलते बच्चे और तितलियां हैं, जबकि पृष्ठभूमि में युद्धग्रस्त शहर की धुंधली छवि दिखाई दे रही है।

सत्य

‘सत्य’ एक गहन और विचारोत्तेजक कविता है, जो अमन के बीच युद्ध की भयावहता, बच्चों की मासूमियत और मानव सभ्यता के क्रूर यथार्थ को सामने लाती है। यह कविता शांति, संवेदना और सत्य की खोज का मार्मिक दस्तावेज है।

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war battlefield with soldier and emotional mother with child, symbolizing pain of war and hope for peace

जब तितलियाँ सरहदों से परे उड़ती हैं

“युद्ध में न कोई जीतता है, न कोई हारता…
जो सबसे भयावह युद्ध होते हैं,
वो मांओं, पत्नियों और बच्चों के भीतर
बिना हथियार लड़े जाते हैं।
काश! तितलियाँ सरहदों से परे
एक ऐसे देश में ले जाएं,
जहां सिर्फ फूल हों,
और मां की गोद ही अंतिम शरण हो।”

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