मैं जानता हूँ, फिर भी…

युद्ध के बाद ध्वस्त शहर में मलबे के बीच खेलते बच्चे और क्षितिज पर उगती आशा की किरण, जो शांति और मानवता का प्रतीक है।

राकेश चंद्रा

मैं जानता हूँ कि
मेरे असीमित दुख और सीमित सुख
कालजयी नहीं हैं।
इन्हें एक दिन
मन के अनंत विस्तार में
विलीन हो जाना है।

फिर भी
मैं विलाप करता हूँ,
जब आकाश से
बिजली की गति से गिरते हैं ड्रोन
और चीर देते हैं धरती का सीना,
जिनमें अक्सर समा जाता है
मासूम बच्चों का जीवन,
महिलाओं का यौवन
और वृद्धों की साँसों का कंपन,
उनकी पलक झुकने से पहले।

फिर भी
मैं खुश होता हूँ,
जब बंद हो जाती हैं
मिसाइलों और बमवर्षक विमानों की आवाज़ें,
जो स्थायी शांति की
एक उम्मीद जगाती हैं।

देखते ही देखते
एक बार फिर निकल आते हैं
भयभीत लोग सड़कों पर,
और सुनाई पड़ने लगती हैं
मंदिर की घंटियाँ,
मस्जिदों की अज़ान
और गिरजाघरों के घंटों की
सम्मोहक ध्वनियाँ।

मैं खुश हो जाता हूँ
युद्ध-विराम के उन क्षणों में,
जब जीवन
आहिस्ता-आहिस्ता
फिर से पटरी पर लौटने लगता है।

मुझे अच्छा लगता है,
जब लौट आती हैं
बच्चों की किलकारियाँ,
स्त्रियों का स्वच्छंद हास-परिहास
और वृद्धजनों की
पोपली हँसी।

मैं जानता हूँ कि
यह सब स्थायी नहीं है।
अँधेरों और उजालों को भी
एक दिन
ठीक मेरी तरह
अपने निर्धारित समय पर
विलीन हो जाना है।

पर युद्ध और शांति के बीच
मुझे नहीं मरने देना है
अपनी दुर्धर्ष जिजीविषा को,
जो अनमोल मानवता के लिए
प्राणवायु है।

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