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कर्ण की व्यथा

रथ के पास खड़े सूर्यपुत्र कर्ण का गंभीर और चिंतनशील स्वरूप, जो अपनी नियति और पहचान के संघर्ष को दर्शाता है।

अंशु गुप्ता, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

देख ज़रा निर्मल मन से,
अंश तेरा कहे हर कण से।
होकर भी सूर्यपुत्र कर्ण,
मैं क्यों भोग रहा सूतपुत्र का जीवन?

देख, विधाता! विधान तेरा,
छीन लिया मुझसे ही पहचान मेरा।
हूँ दानवीर कहलाता, तुच्छ आज हूँ,
मैं सूर्यपुत्र कहूँ या सूतपुत्र, मैं अंगराज हूँ।

खोल अपनी नियति तू,
देख, बस मेरी आत्मा बिलखती क्यों?

हे परमपिता! तू पूजनीय,
हर कार्य तेरा सराहनीय।
क्यों हूँ मैं सौतेला?
रिश्ते रहते हुए भी,
मैं पड़ा हूँ अकेला।

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