
अनामिका अर्श
मुद्दतों बाद मेरा अनुरागी मन मुस्कुराया है….
अमावस की अंधियारी रात में मानो चाँद निकल आया है….।
गुमसुम थीं मेरे दिल की धड़कनें….
इश्क़ का करिश्मा है ये या जादूगरी,
मेरा रूठा हुआ सुर लौट आया है….।
तलाशती रही उम्र भर दूसरों में मुहब्बत….
भूल गई थी कि दिव्य प्रेम का स्रोत तो मुझमें ही समाया है….।
वैरागी मन मेरा श्रृंगार में हो रहा है अनुरक्त….
पतझड़ पर जैसे ऋतुराज बसंत ने नेह बरसाया है….।
दर्पण छेड़खानी पर उतर आया है….
जीवन-संध्या में भोर का ध्रुवतारा नज़र आया है….।
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मेरी रचना को बेहद खूबसूरती से अपने अखबार /पत्रिका Live Wire News में प्रकाशित करने के लिए संपादक आदरणीय श्री सुरेश परिहार जी का आत्मीय धन्यवाद हृदय तल से 🙏🌷।
सुंदर सी अभिव्यक्ति 👌