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युद्ध के बाद ध्वस्त शहर में मलबे के बीच खेलते बच्चे और क्षितिज पर उगती आशा की किरण, जो शांति और मानवता का प्रतीक है।

मैं जानता हूँ, फिर भी…

‘मैं जानता हूँ, फिर भी…’ एक विचारोत्तेजक मुक्तछंद कविता है, जो युद्ध की भयावहता, निर्दोष लोगों की पीड़ा, युद्ध-विराम की राहत और मानवता की अमर जिजीविषा को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। यह कविता विनाश के बीच भी उम्मीद और शांति के महत्व को रेखांकित करती है।

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