Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
युद्ध के बाद ध्वस्त शहर में मलबे के बीच खेलते बच्चे और क्षितिज पर उगती आशा की किरण, जो शांति और मानवता का प्रतीक है।

मैं जानता हूँ, फिर भी…

‘मैं जानता हूँ, फिर भी…’ एक विचारोत्तेजक मुक्तछंद कविता है, जो युद्ध की भयावहता, निर्दोष लोगों की पीड़ा, युद्ध-विराम की राहत और मानवता की अमर जिजीविषा को संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त करती है। यह कविता विनाश के बीच भी उम्मीद और शांति के महत्व को रेखांकित करती है।

Read More
जीवन, प्रकृति और अनुभूति पर आधारित हिंदी कविता “मैं कविता हूँ” का भावात्मक चित्र

मैं कविता हूँ…

मैं कविता हूँ” केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का स्वीकार है। दुख, सुख, प्रकृति और समय के बीच कविता स्वयं को खोजती और सदा जीवित रहती है।

Read More

अँधेरे में जुगनू

यह कविता प्रेम, प्रतीक्षा और आत्मसंवाद का सूक्ष्म आख्यान है। चाँद और बाहरी रोशनी को ठुकराकर कवयित्री अपने भीतर के जुगनुओं की रोशनी पर भरोसा करती है। लेकिन प्रेम की इच्छा जब प्रतीक्षा का दीपक बन जाती है, तो वही रोशनी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। यह रचना उस क्षण को पकड़ती है, जब मन अँधेरे से डरता नहीं, बल्कि उसे शांति और मुक्ति का स्थान मानने लगता है।

Read More