
रेखा हजारिका, लखीमपुर
सड़क किनारे सोया वो भिखारी
लगता है मुझसे भी ज़्यादा सुखी है।
उसके पास नींद है,
मेरे कमरे का शोर भी
उसकी नींद में खलल नहीं डाल पाता।
एक घड़ी की नींद उधार देगा क्या मुझे?
मुझे तो इस नींद की बहुत कमी है।
एसी कमरे में नरम बिस्तर,
मन में मेरे बेअंत अशांति।
इतनी सुकून भरी नींद कहाँ से उतरती है
तेरी दो आँखों में?
मेरी दो आँखों से नींद उड़ी है,
कितने हिसाब, कितने गुणा-भाग—उड़ते हैं रात भर।
मिलते और न मिलते अंक एक हो जाते हैं
मेरी हिसाब की कॉपी में।
महलों की दीवारों पर अमीरी के
रंगीन सपनों का रंग चाटकर ले जाता है
नींद का स्वाद।
सड़क किनारे की गरीबी में क्यों रहती है
थकी हुई गहरी नींद…
