
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
रक्षाबंधन पर भाई अपनी बहन की कलाई पर राखी बंधवाता है और उसकी रक्षा का वचन देता है. बहन भी भाई की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करती है. लेकिन जबलपुर की राखी गुप्ता (यदु) ने इस रिश्ते को एक ऐसी गहराई दे दी, जहाँ वचन शब्दों में नहीं, बल्कि अपने शरीर का एक हिस्सा देकर निभाया गया.राखी ने अपने छोटे भाई सोनू यदु को अपनी किडनी दान कर दी. वर्षों से बीमारी और डायलिसिस के बीच जिंदगी गुजार रहे सोनू के लिए बहन का यह फैसला किसी उपहार से कम नहीं, बल्कि एक नई जिंदगी की शुरुआत है.
भाई को दर्द में देखा तो बहन ने अपना फैसला कर लिया
सोनू पिछले सात वर्षों से गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे थे. करीब चार वर्षों से उनका नियमित डायलिसिस चल रहा था. हर कुछ दिनों में अस्पताल की यात्रा, डायलिसिस की प्रक्रिया और बीमारी के साथ बढ़ती तकलीफ ने उनकी जिंदगी को बेहद कठिन बना दिया था.भाई को इस तरह संघर्ष करते देखना राखी के लिए आसान नहीं था. कुछ साल पहले पति के निधन के बाद राखी अपने मायके में भाई और भाभी के साथ रहने लगी थीं. शायद इसी वजह से भाई का दर्द उनके लिए केवल किसी करीबी रिश्तेदार की तकलीफ नहीं था. वह उनके अपने जीवन का हिस्सा बन चुका था. जब किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत सामने आई तो राखी ने किसी और का इंतजार नहीं किया. उन्होंने खुद अपनी किडनी देने का निर्णय लिया. यह निर्णय जितना भावुक था, उतना ही साहस से भरा भी.
रक्षाबंधन पर भाई को मिला सबसे अनमोल उपहार

10 अगस्त को नागपुर के एक किडनी केयर अस्पताल में राखी और सोनू का सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया गया. ऑपरेशन के बाद भाई की देखभाल की जिम्मेदारी भी राखी ने अपने कंधों पर ले ली.बुधवार को सोनू के टांके काटे गए. डॉक्टरों की सलाह के अनुसार राखी अगले तीन महीने तक नागपुर में रहकर भाई की देखभाल करेंगी.राखी ने कहा, “भाई हमेशा बहन को उपहार देते हैं, लेकिन इस रक्षाबंधन पर मैंने अपने भाई और पूरे परिवार को सबसे अनमोल तोहफा दिया है.”इस एक वाक्य में शायद पूरे रिश्ते की कहानी समाई हुई है. जिस भाई की कलाई पर हर साल राखी बाँधी जाती रही होगी, इस बार उसी भाई की जिंदगी बचाने के लिए बहन ने अपनी किडनी दे दी.
यह सिर्फ भाई को जीवन देने की कहानी नहीं

राखी का फैसला केवल एक परिवार की निजी कहानी नहीं है. यह उस विश्वास की कहानी भी है, जो मुश्किल समय में रिश्तों को शब्दों से कहीं आगे ले जाता है.सोनू के दो छोटे बच्चे हैं. उनके लिए पिता का स्वस्थ होकर घर लौटना सिर्फ एक चिकित्सकीय सफलता नहीं, बल्कि उनके बचपन की सबसे बड़ी खुशियों में से एक है.एक बीमारी ने जिस परिवार से वर्षों का चैन छीन लिया था, उसी परिवार में अब उम्मीद लौट रही है. डायलिसिस की लंबी पीड़ा के बाद सोनू को सामान्य जीवन की ओर लौटने का अवसर मिला है. और इस अवसर के पीछे खड़ी हैं उनकी बहन राखी, जिन्होंने भाई के लिए केवल प्रार्थना नहीं की, बल्कि अपनी ओर से वह सब किया जो संभव था.
राखी अब सिर्फ कलाई पर नहीं, जिंदगी में बंधी है
राखी का धागा कुछ घंटों या एक दिन का प्रतीक नहीं होता. वह भाई-बहन के बीच उस विश्वास की याद दिलाता है, जो जीवन के कठिन से कठिन दौर में भी साथ रहने का भरोसा देता है.राखी ने उस विश्वास को अपने निर्णय से सच कर दिखाया.इस बार शायद उनके भाई की कलाई पर बंधी राखी का अर्थ पहले से कहीं अधिक गहरा होगा. क्योंकि उस कलाई तक जिंदगी की धड़कन पहुँचाने में उनकी बहन का भी एक हिस्सा शामिल है.रिश्तों की खूबसूरती शायद यही है—कभी भाई बहन की रक्षा का वचन देता है, तो कभी बहन बिना किसी शर्त के भाई की जिंदगी की रक्षा के लिए आगे आ जाती है.जबलपुर की राखी की कहानी हमें याद दिलाती है कि कुछ उपहार बाजार से नहीं खरीदे जाते. वे प्रेम, त्याग और अपनेपन से बनते हैं. और इस रक्षाबंधन पर सोनू को मिली राखी की सबसे बड़ी सौगात कोई उपहार नहीं, बल्कि एक नई जिंदगी है.
