
पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर
मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता था। उनके घर में उनकी दो बेटियाँ थीं। हम लोग साथ स्कूल जाते थे, साथ खेलते थे। एक दिन अचानक उसकी तबीयत बहुत खराब हो गई और वह खेलते-खेलते ज़मीन पर गिर गई।
हम सबके ज़ोर से चिल्लाने पर कुछ लोग बाहर आ गए।
सरिता के घर से कोई नहीं निकला। हमने ज़ोर से आवाज़ लगाई, “चाचा, जल्दी निकलाइए, सरिता गिर गई है।”
तभी सभी लोग दौड़े और उन्हें उठाकर जल्दी से पानी छिड़का, ताकि वह होश में आ सके, लेकिन अचानक उसकी तबीयत बिगड़ने लगी।
तभी उसे सामने के अस्पताल में ले जाया गया। वहाँ उसका पूरा ट्रीटमेंट हुआ। कुछ दिन के बाद वह ठीक हुई, फिर घर आई।
कुछ दिन के बाद उसको इसी तरह चक्कर फिर आया और वह गिर गई। पूरा हाथ-पैर उसके फूल चुके थे। हम लोग भी समझ नहीं पा रहे थे कि इसे क्या हो जाता है।
फिर मेरे पिता ने चाचा जी से कहा कि जल्दी से अस्पताल ले जाइए और इसकी पूरी जाँच करवाइए।
जब जाँच हुई तो पता चला कि उसकी किडनी खराब है। जब वह घर आकर हम सबको बताए, तो एक पल के लिए तो हमें लगा कि किडनी क्या होती है?
हमें समझ नहीं आया। फिर हमने अपने पिता से पूछा। पिता ने बताया कि शरीर के खून को साफ करने का एक तरह का मशीन होता है। हमने भी सोचा, अच्छा, ऐसा भी होता है।
हम लोग पाँचवीं कक्षा में साथ पढ़ते थे।
हमें इस तरह की बीमारी की जानकारी कुछ भी नहीं थी।
इसी तरीके से कुछ दिन बीत गए। एक दिन अचानक इतनी हालत खराब हो गई कि उसके पिता ने फिर से अस्पताल में दाखिल करवाया। तो पता चला कि दोनों किडनी खराब हो गई हैं।
डॉक्टर ने कहा, “डायलिसिस करना होगा, वरना यह नहीं बचेगी।” उसके बाद उसका डायलिसिस होना शुरू हुआ।
फिर एक समस्या खड़ी हुई कि किडनी कहाँ से मिले, ताकि इसकी किडनी बदल सके। पर ऐसी समस्या आ गई कि कोई डोनर नहीं मिल रहा था।
फिर लास्ट में माँ ने कहा कि मैं ही अपनी किडनी दे देती हूँ। फिर अपनी बेटी सरिता को लेकर अस्पताल चले गए।
जाने के बाद पूरा चेकअप हुआ। उसके बाद उसका ऑपरेशन हुआ।
हम सभी सहेलियाँ इंतज़ार कर रही थीं उसके ठीक हो जाने का।
हम सबने अपने पिता से कहा कि मुझे अपनी सहेली को देखने जाना है और ज़िद करके हम पाँच सहेलियाँ अपने पिता के साथ अस्पताल चले गए।
हम सभी वार्ड में सरिता से मिलकर ढेर सारी बातें कर रहे थे और उस दिन रक्षाबंधन था। हम सबने एक-दूसरे को राखी बाँधी, मिठाई खिलाई।
बगल के बेड पर एक पेशेंट था, जो रो रहा था। उसका भी किडनी का ऑपरेशन हुआ था।
हम सबने पूछा, “क्या हुआ अंकल, आप क्यों रो रहे हैं?”
तो उन्होंने कहा, “आज साल भर का दिन है, रक्षाबंधन पर्व है। आज का दिन भी मेरे हाथ की कलाई सूनी है।”
तभी मेरी दोस्त की माँ ने कहा, “मुझे बहन बना लो, मैं राखी बाँध देती हूँ। रोने की कोई ज़रूरत नहीं।”
फिर चाची ने राखी मँगाकर मस्तक पर तिलक लगाकर कलाई पर राखी बाँधी और एक नया भाई-बहन का रिश्ता बना।
वह रिश्ता इतना गहरा हुआ कि अपनों से ज़्यादा सगा हो गया।
उस अनोखे रिश्ते में उस भाई ने चाची को बड़ी दीदी कहकर पुकारा और पैर छूकर प्रणाम किया।
रक्षाबंधन का रिश्ता बना।
हर राखी में अपनी बहन के घर पहुँच जाते हैं। इधर चाची भी सारी तैयारी करके रखतीं। मुँहबोला भाई भी खूब सारे गिफ्ट लेकर के आता।
इस भाई-बहन का अनोखा प्रेम देखकर सच में बहुत ही खुशी होती है।
आज तक मेरी स्मृति से यह दिन जाता नहीं है।
लेकिन कुछ ही दिन पहले उनका निधन हो गया और उसके कुछ दिन बाद चाची जी का भी निधन हो गया और सरिता का भी।
मगर यह प्रेम हमेशा संस्मरण बनकर हम सबकी स्मृति में सदा बना रहेगा।
