एक अफवाह, एक हादसा और खुल गई इंसानियत की असली तस्वीर

सुजाता चक्रवर्ती, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
“मां……! मैं खेलने जा रहा हूं।” भैया ने मां को आवाज़ दी। सुनते ही मां सारे काम-काज छोड़कर दौड़कर आई और कहने लगी कि छगन के साथ खेलना है तो खेलना, मगर उसके घर मत जाना। मैदान में ही खेलना और छगन की मां के सामने मत जाना, समझे।
“ठीक है, मां…!” कहता हुआ भैया अपनी पतंग और लटाई लेकर चलता बना।
हमारे घर के पास एक पहाड़ी नदी बहती थी, नाम था “अरपा”। साल भर नदी सूखी रहती थी, बरसात के समय नदी अपने पूरे शबाब में रहती थी और तभी उसके रौद्र रूप का दर्शन होता था। नदी के किनारे कुछ कच्चे-पक्के मकान थे, जहां ज्यादातर लोग गरीब तबके से थे। छोटी-मोटी मजदूरी करके अपना पेट पालते थे। कोई धोबी था तो किसी के यहां की महिलाएं बर्तन, झाड़ू-पोंछा का काम करती थीं। उनके बच्चे भी हमारी ही तरह सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते थे और वो वक्त ऐसा था, तब इतनी ऊंच-नीच की भावनाएं नहीं थीं। हम सभी मोहल्ले के बच्चे एक साथ खेलते थे। उनमें से कोई डॉक्टर का बेटा था, कोई धोबी का तो कोई सरकारी ऑफिसर का भी बेटा था। हम सभी मिल-जुलकर खेलते थे।
किंतु छगन की मां के बारे में कुछ अफवाहें बनी हुई थीं, जिसके कारण मोहल्ले वाले उनसे दूरियां बनाकर रखते थे। ये खबर कामवाली बाई के जरिए मां के कानों तक पहुंची। वही बोली थी, “बच्चों को छगन के साथ खेलने मत देना, उसकी मां जादू-टोना करती है।” इसी का नतीजा यह था कि छगन और उसकी बहन के साथ कम खेलने की हिदायत के साथ उनके घर न जाने की चेतावनी हम सभी बच्चों को अक्सर मिलती रहती थी।
हमारा परिवार संयुक्त परिवार था। हम सभी भाई-बहन और मोहल्ले के बच्चे मिलकर प्रायः सूखी नदी में पतंग उड़ाने जाते थे। मां और ताईजी की सख्त हिदायत भूलकर हम सभी बच्चे प्रेम-भाव से खेलते थे।
उस दिन हम सभी बच्चे प्रायः दिनों की तरह नदी के बीच में खेल रहे थे। उस दिन छगन हमारे साथ खेलने नहीं आया था, वो अपने पिता के काम में सहायता करने गया था। हम सभी बच्चे खेल में मस्त थे कि अचानक किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई। हमने देखा कि छगन की मां हांफती, चिल्लाती, बेसुध-सी हमारी तरफ दौड़ती हुई आ रही थी।
“भागो…….! भागो……..! खुटाघाट बांध से पानी छोड़े हे……! नदिया ले बाहर निकलो।” कहते हुए हमारे पास पहुंची। तब तक हम बच्चे दौड़ लगाना चालू कर दिए थे। जो सबसे छोटा था, उसको अपनी गोद में उठा लिया और हमारे साथ-साथ किनारे तक आई। किनारा ऊंचा था। सभी बच्चों को तत्परता के साथ ऊपर चढ़ाया, फिर खुद ऊपर आई। तब तक नदी में पानी का बहाव आना शुरू हो गया था।
इस घटना को हम विस्मय से देख रहे थे। जहां हम खेल रहे थे, वहां लबालब पानी भर चुका था। अगर थोड़ी देर होती तो हम सभी बच्चों का “जल समाधि” होना तय था और यही सोचकर हम सभी बच्चे थर-थर कांप रहे थे। छगन की मां हम सभी बच्चों को जिम्मेदारी के साथ सकुशल घर पहुंचाई।
हमारे घर पहुंचते ही छगन की मां को साथ देखकर घर वाले घबरा गए। छगन की मां बोली, “मैं अपन बाई घर काम करत रहें, तभी मोला पता चलिस खुटाघाट बांध से पानी छोड़े हे। मैं सब्बो काम ला छोड़ के दौरत भागत नदिया तरफ आएं हावं…! मोला मालूम रहिसे कि लइका मन नदिया तीर खेलत होही….! भगवान के दया से लइका मन ला कुछु नइ होइस….! आप मन माता जी के मंदिर में जाके नारियल जरूर फोड़हू…!”
घर वाले सभी निर्वाक होकर खड़े थे और मेरी मां बोल पड़ी, “छगन की मां, मैं तुम्हें धन्यवाद भी नहीं दे सकती। तुम हम सभी से बहुत ऊपर हो…!”
मां की आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। छगन की मां पता नहीं क्या समझी, बोल पड़ी, “मोर बहुत काम बचें हे।”
“मझली बहु, घबरा झन। कोनो तकलीफ होही तो मोला बुला लेबे।”
बोलकर छगन की मां चली गई……!
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