
मौसमी चंद्रा, पटना
संध्या के बाद
किसी पुराने घर की खिड़की को
बिना आवाज़ के बंद होते सुना है?
मैं उसी खिड़की की तरह बंद होना चाहती हूँ!
न कोई प्रश्न,
न लौटने की प्रतीक्षा,
न किसी स्मृति के द्वार पर
मेरे होने की दस्तक!
मुझे जानने वाले अपनी गति में अक्षुण्ण रहें…
उनके आसपास वही कोलाहल बना रहे!
मैं उस सबके बीच अपनी आकृति को धीरे-धीरे
पारदर्शी कर देना चाहती हूँ!
जल पर पड़ा हुआ चाँद का प्रतिबिंब देखा है!
उसी क्षणिक प्रतिबिंब की तरह!
मुझे किसी की कहानी का अंतिम वाक्य नहीं बनना,
न किसी की स्मृति में एक भारी अध्याय!
मैं बस वह रिक्त स्थान होना चाहती हूँ
जिसके होने-न-होने से किसी का क्रम न टूटे!
किसी के जीवन पर अपनी अनुपस्थिति का भार रखे बिना,
किसी की रोशनी कम किए बिना,
चाहती हूँ बस इतना-सा अदृश्य होना!
