प्रकृति और मैं…

धूल से ढके पेड़ के नीचे साइकिल के पास खड़ी एक लड़की, पर्यावरण और प्रकृति के संवाद का प्रतीक

एक पत्ती की मार्मिक चेतावनी

शालिनी श्रीनेत, गाजियाबाद

साइकिल चलाते-चलाते दूर निकल गई
और एक जगह जाकर थकान की वजह से
साइकिल रोककर वृक्ष के नीचे खड़ी हो गई
वृक्ष की पत्तियां धूल से पटी पड़ी थीं
मैं उन्हें निहार रही थी
कि तभी एक पत्ती झुकी और पूछने लगी-
क्या देख रही हो इतने गौर से?
मैंने कहा- जमी हुई धूल
अक्तूबर महीने में पत्तियों पर इतनी धूल?
न आंधी न तूफान फिर इतनी धूल कैसे?
पत्ती थोड़ी और झुकी और बोली-
बेटा, बहुत नादान लगती हो,
अब तो हर रोज आंधी तूफान है…
तुन्हें दिख नहीं रहा है शायद?
मैंने कहा- आंधी तूफान आता है तो मुझे पता चलता है
पेड़ हिलने लगते हैं, कुछ गिर भी जाते हैं
दरवाजे खिड़कियां खड़खड़ाने लगते हैं
इसीलिए तो कह रही हूँ कि तुम नादान हो,
थोड़ी देर बैठो तो एक छोटी-सी कहानी सुनाऊं?
मैंने कहा- पर थोड़ी ही देर नहीं तो अंधेरा हो जाएगा…
हां, बैठो ! जब कलयुग शुरू हुआ
तो हमारे और मानव के बीच एक डील हुई थी
मैं हस्तक्षेप नहीं करूंगी… हमारे साथ कुछ भी करें,
चाहे जितना छेड़ें, टोकाटाकी नहीं करूंगी
पर हां, साल दो साल पर आपदा के रूप में आऊंगी
और तहस-नहस करके जाऊंगी
मानव ने कहा, डील मंजूरी है
साल दो साल में बस एक ही बार न?
हमने कहां हां बस…
पूरे समय कोई काटता है
कोई गिराता है
कोई फावड़े से कोड़ देता है
मेरी पहाड़ जैसी विशालता को भी
लोग फावड़े से लेकर बड़ी मशीनों तक से तोड़ देते हैं
जब मैं आपदा के रूप में आती हूँ तो लोग त्राहि-त्राहि करने लगते हैं
और कहते हैं – प्रकृति ने बदला लिया
सब समझ जाते हैं पर रोज का जीवन
सामान्य नहीं बनाते
कि सामान्य जीवन पसंद नहीं
रोज कुछ नया रोमांचित करने वाला चाहिए
आज का जो समय है
लोग आपदा में भी आनंद लेने लगे हैं
देखो न, किसी के भूखे प्यासे मरने की
किसी के नंगे रहने
किसी के नंगे पांव चलने की
फोटो ली जाती है… और वाह-वाह होती है !
फिर प्रकृति ने सवाल पूछा-
तुम इमोशनल तो नहीं हो न?
मैंने कहा- थोड़ी थोड़ी हूँ !
तब मेरी बात समझ में आएगी…
जानती हो, धुआँ छोड़ती गाड़ियां जब बगल से गुजरती हैं तो बहुत जलन होती है,
जब ज्यादा फल लगने के लिए इंजेक्शन और दवाइयां छिड़के जाते हैं तो भी पीड़ा होती है,
जब लोग काटते हैं तो हम रोते हैं
पर याद आता है,
हमारे और मनुष्य के बीच तो डील हुई है !
वो कुछ भी कर सकते हैं…
मैं तो साल दो साल पर एक बार ही आ सकती हूँ
आपदा के रूप में !!

लेखिका के बारे में-

शालिनी श्रीनेत
एक सशक्त सामाजिक कार्यकर्ता, विचारक और “मेरा रंग फाउंडेशन” की संस्थापक एवं मैनेजिंग ट्रस्टी हैं।
उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक और रुहेलखंड विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है।
बरेली में मूक-बधिर बच्चों के लिए कार्य करते हुए उन्होंने समाज सेवा की मजबूत नींव रखी।
साल 2016 में एक यूट्यूब चैनल के रूप में “मेरा रंग” की शुरुआत कर उन्होंने जेंडर और स्त्री सुरक्षा जैसे मुद्दों को नई आवाज दी।उनके संवेदनशील और जागरूकता से भरे इंटरव्यूज़ को व्यापक सराहना मिली। आज “मेरा रंग” एक पंजीकृत संस्था के रूप में महिला सशक्तिकरण और जेंडर अवेयरनेस पर सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। उन्होंने एनडीटीवी, दिल्ली पोएट्री फेस्टिवल जैसे मंचों से भी अपने विचार प्रभावशाली ढंग से साझा किए हैं। ‘मेरी रात मेरी सड़क’ जैसे अभियानों के माध्यम से उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को सशक्त स्वर दिया है। साथ ही “रंग सार्थक प्रोजेक्ट” के जरिए वे महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सराहनीय कार्य कर रही हैं।

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