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धूल से ढके पेड़ के नीचे साइकिल के पास खड़ी एक लड़की, पर्यावरण और प्रकृति के संवाद का प्रतीक

प्रकृति और मैं…

यह रचना मनुष्य और प्रकृति के बीच के गहरे और जटिल संबंध को उजागर करती है। एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली घटना एक लड़की का साइकिल रोककर पेड़ के नीचे खड़ा होना. धीरे-धीरे एक गहन संवाद में बदल जाती है, जहाँ एक पत्ती स्वयं बोलकर प्रकृति की पीड़ा व्यक्त करती है।

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एक प्रतीक्षा…

यह कविता जीवन में प्रतीक्षा की गहराई को उजागर करती है। इसमें मनुष्य के उस भाव को चित्रित किया गया है जहाँ वह प्रकृति या ईश्वर की अदृश्य उपस्थिति को महसूस करता है—एक ऐसा विश्वास जो जीवन को समेटता है, उसे संपूर्णता देता है। प्रतीक्षा केवल किसी घटना की नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म संवेदनाओं, विरासत की प्रतिध्वनियों और जीने के अनगिनत रंगों की है। यह प्रतीक्षा जीवन की हर ध्वनि, रूप, पहचान और संबंध को आत्मसात करने की है, जिसमें प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अंश समाहित हो। कविता कहती है कि सच्ची प्रतीक्षा वही है, जिसमें जीवन और ब्रह्मांड के साथ एकत्व का अहसास जुड़ा हो।

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