गाँव के घर के बाहर प्रतीक्षा करते बुजुर्ग माता-पिता और मिट्टी, पेड़ों व अपनापन से भरा ग्रामीण दृश्य।

चलो चलें अब गाँव

यह कविता गाँव की मिट्टी, रिश्तों की गर्माहट और अपनों के स्नेह की ओर लौटने की भावनात्मक पुकार है। शहर की भागदौड़ में छूट गए गाँव, बूढ़े माता-पिता और सूने खलिहानों की याद मन को बार-बार अपनी जड़ों की ओर खींचती है। कविता बताती है कि गाँव में रिश्ते दिखावे से नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम से निभाए जाते हैं, जहाँ सुख-दुख बाँटकर जीवन जिया जाता है। पीपल, बरगद और आम की छाँव, शुद्ध हवा और मिट्टी का सहज स्पर्श उस आत्मीय सुख का एहसास कराते हैं, जो कहीं और दुर्लभ है।

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धूल से ढके पेड़ के नीचे साइकिल के पास खड़ी एक लड़की, पर्यावरण और प्रकृति के संवाद का प्रतीक

प्रकृति और मैं…

यह रचना मनुष्य और प्रकृति के बीच के गहरे और जटिल संबंध को उजागर करती है। एक साधारण-सी प्रतीत होने वाली घटना एक लड़की का साइकिल रोककर पेड़ के नीचे खड़ा होना. धीरे-धीरे एक गहन संवाद में बदल जाती है, जहाँ एक पत्ती स्वयं बोलकर प्रकृति की पीड़ा व्यक्त करती है।

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