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ग्रामीण बस स्टैंड पर डरी हुई स्कूल गर्ल, महिला सुरक्षा और शिक्षा पर सवाल

स्वाभिमान का खून

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा क्या सिर्फ दिखावा बनकर रह गया है? यह लेख बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान की जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।

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दौड़

**Blurb:**

कहानी *“रेस”* आधुनिक प्रकाशन जगत की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ प्रतिभा नहीं, नाम बिकता है। एक साधारण लेखिका की शानदार कहानी केवल इसलिए अस्वीकृत कर दी जाती है क्योंकि उसके पास कोई पहचान नहीं। संपादक के लिए रचनाएँ नहीं, “ब्रांड” मायने रखते हैं। सहायक आलोक के भीतर उठता द्वंद्व और अंत में उसकी मजबूर चुप्पी – यही इस कहानी का दर्द है। यह सिर्फ एक दफ्तर का दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की झलक है जहाँ शब्दों की जगह प्रसिद्धि का शोर गूँजता है।

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समाज की संवेदनहीनता पर आधारित हिंदी कविता, जिसमें गंदगी, सफाई कर्मी की पीड़ा, पुल हादसा, अस्पताल लापरवाही और शिक्षा के व्यवसायीकरण को दर्शाया गया है

छोड़ो ना अपना क्या जाता है… 

हर बार जब समाज की किसी समस्या पर हम चुप रह जाते हैं और सोचते हैं“अपना क्या जाता है”, तब इंसानियत थोड़ा और मर जाती है। यह कविता उसी संवेदनहीन सोच पर तीखा प्रहार करती है।

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