स्वाभिमान का खून
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा क्या सिर्फ दिखावा बनकर रह गया है? यह लेख बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान की जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा क्या सिर्फ दिखावा बनकर रह गया है? यह लेख बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान की जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।
**Blurb:**
कहानी *“रेस”* आधुनिक प्रकाशन जगत की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ प्रतिभा नहीं, नाम बिकता है। एक साधारण लेखिका की शानदार कहानी केवल इसलिए अस्वीकृत कर दी जाती है क्योंकि उसके पास कोई पहचान नहीं। संपादक के लिए रचनाएँ नहीं, “ब्रांड” मायने रखते हैं। सहायक आलोक के भीतर उठता द्वंद्व और अंत में उसकी मजबूर चुप्पी – यही इस कहानी का दर्द है। यह सिर्फ एक दफ्तर का दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की झलक है जहाँ शब्दों की जगह प्रसिद्धि का शोर गूँजता है।