
सविता सिंह “मीरा” जमशेदपुर
कभी-कभी साइड लोअर बर्थ पर
वो सफ़र मुझे छू जाता है,
जैसे कोई मौन प्रेमी
चुपके से पास आ जाता है।
नदी, पोखर, खेत, किनारे
सब उसके तराने लगते हैं,
उसकी बाहों में सिमटे पल
मुझको मेरे ही गाने लगते हैं।
पटरी पर सरपट दौड़ती धड़कन,
उसका ही तो आलाप लगे,
हर झोंके में, हर कंपन में
उसका मुझसे संवाद लगे।
जब पुल से होकर गुजरती है,
वो गहरी-सी गूँज उठती है,
जैसे उसकी धड़कन मेरी
धड़कनों से मिल झूम उठती है।
अनजाने से छोटे स्टेशन पर
जब वो क्षण भर को ठहरता है,
जैसे कोई बिछड़ा प्रेमी
मुझको फिर से निखरता है।
भीड़ में भी वो ढूँढे मुझको,
मैं भी उसे पुकारती हूँ,
उसकी रफ़्तार की लय में ही
अपने मन को सँवारती हूँ।
यादें, कसक, वेदना की लहरें
उसकी आँखों में बहती हैं,
उसकी खिड़की से झाँकती मैं
अपनी ही छवि कहती हूँ।
न जाने कैसा रिश्ता है ये,
जो हर सफ़र में बँध जाता है,
वो रेल नहीं—मेरा प्रेमी है,
जो मुझमें ही बस जाता है।
साइड लोअर की उस चुप दुनिया में
जब भी मैं खो जाती हूँ,
उसके संग-संग चलते-चलते
मैं खुद से ही मिल जाती हूँ।
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