खामोश रिश्ते

भीड़भाड़ वाली शहर की सड़क पर अकेला बैठा एक उदास व्यक्ति, आसपास लोग मोबाइल में व्यस्त, आधुनिक जीवन की संवेदनहीनता और अकेलेपन का दृश्य

माधवी उपाध्याय, जमशेदपुर (झारखंड)

हो गया है क्या…!
कौन सुनता है किसी को आजकल,
अपनी कहनी है सभी को आजकल।।

सिर्फ़ अपनी वाह- वाही चाहिए
क्या हुआ है आदमी को आजकल।।

पास रहकर भी मिले सदियाँ हुईं,
कौन देखे मन दुखी को आजकल।।

मौसमों की बेरहम -सी आंधियाँ,
ले गई उलझा सभी को आजकल।।

रात दिन ग़म से घिरे माहौल में
ढूंढते हैं हम खुशी को आजकल

पीर अब शीतल नहीं है कर रही,
हो गया क्या कौमुदी को आजकल।।
इन रचनाओं को भी पढ़ें और अपनी टिप्पणी दें-
स्वाभिमान का खून
अश्क नहीं, हौसला बनो
प्रतीक्षा में साँसे खड़ी…

One thought on “खामोश रिश्ते

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *