भीड़भाड़ वाली शहर की सड़क पर अकेला बैठा एक उदास व्यक्ति, आसपास लोग मोबाइल में व्यस्त, आधुनिक जीवन की संवेदनहीनता और अकेलेपन का दृश्य

खामोश रिश्ते

यह कविता आधुनिक समाज की उस सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ हर व्यक्ति अपनी ही बात कहने में व्यस्त है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं बचा। रिश्तों की निकटता केवल भौतिक रह गई है लोग पास होकर भी दूर हैं, और मन की पीड़ा अनसुनी रह जाती है।

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लकीरों और दायरों के पार

लकीरों और दायरों ने हमें अलग करने की कोशिश की, पर हर दूरी में तुम और अधिक मेरी ओर सिमट आईं। जिन दीवारों ने हमें रोका था, वे धीरे-धीरे ढहने लगीं। तुम, जो किसी सैलाब की अमानत थीं, अब अपने भीतर की उफान को थामकर शांत बहने लगीं। और जब होंठों ने चुप्पी साध ली, तब निगाहों ने वह सब कह दिया जो शब्दों में बयाँ न हो सका।

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कुछ तो कहो…

यह कविता मानो दो हृदयों के बीच बसा एक मधुर संवाद है। कवि मौन को तोड़ने की विनती करता है, ताकि प्रेम की अनुभूति केवल हृदय में ही न रहे बल्कि शब्दों और भावों में भी प्रकट हो सके। इसमें अनुराग, लज्जा और समर्पण का सहज प्रवाह है। कहीं प्रेयसी का श्रृंगार उसकी प्रतीक्षा का प्रतीक बनता है तो कहीं प्रियतम का एक संकेत ही उसकी जीत ठहरता है। यह रचना प्रेम की उस अनकही भाषा को गूँज देती है, जिसमें मौन भी बोलता है और दृष्टि भी गीत गाती है।

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एक प्रतीक्षा…

यह कविता जीवन में प्रतीक्षा की गहराई को उजागर करती है। इसमें मनुष्य के उस भाव को चित्रित किया गया है जहाँ वह प्रकृति या ईश्वर की अदृश्य उपस्थिति को महसूस करता है—एक ऐसा विश्वास जो जीवन को समेटता है, उसे संपूर्णता देता है। प्रतीक्षा केवल किसी घटना की नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म संवेदनाओं, विरासत की प्रतिध्वनियों और जीने के अनगिनत रंगों की है। यह प्रतीक्षा जीवन की हर ध्वनि, रूप, पहचान और संबंध को आत्मसात करने की है, जिसमें प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अंश समाहित हो। कविता कहती है कि सच्ची प्रतीक्षा वही है, जिसमें जीवन और ब्रह्मांड के साथ एकत्व का अहसास जुड़ा हो।

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