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घर में उदास बैठा पिता और मोबाइल में व्यस्त बच्चे, बदलते पारिवारिक रिश्तों का दृश्य

बाप रे बाप

यह व्यंग्यात्मक लेख “बाप रे बाप” भारतीय समाज में “बाप” की बदलती छवि और उसकी सामाजिक स्थिति पर तीखा लेकिन हास्यप्रद कटाक्ष करता है। कभी परिवार का केंद्रबिंदु और अनुशासन का प्रतीक रहा “बाप”, अब अपने ही बच्चों और समाज के व्यवहार से हास्यास्पद स्थिति में आ गया है। बेटे बाप के नाम पर ऐश करते हैं, पर उसकी इज्जत नहीं रखते। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक, हर कोई “बाप” बनने की होड़ में है — असली अर्थों में नहीं, बल्कि रुतबे के लिए। लेख एक गहरी सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ बाप अब ATM, चेकबुक, और ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाली जाने वाली वस्तु बनकर रह गया है।

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आधुनिक समाज के दिखावे और बाहरी चमक में खोते मानवीय मूल्यों को दर्शाती प्रतीकात्मक कलात्मक छवि।

दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता

यह कविता आधुनिक समाज के दिखावे, दोगलेपन और खोते मानवीय सलीके पर सवाल उठाती है। बाहरी चमक और भाषा के आडंबर में दबते चरित्र और विचारों की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है।

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डिब्बे वाले

“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।

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