दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता

आधुनिक समाज के दिखावे और बाहरी चमक में खोते मानवीय मूल्यों को दर्शाती प्रतीकात्मक कलात्मक छवि।

उमा पाटनी ‘अवनि’ पिथौरागढ़

व्यर्थ नज़ाकत की धुंध में विचार हुए हैं लापता,
दोगलेपन का रिवाज़ है भाई,
चरित्र का किसको पता।

सीखने की कला ठीक है,
पर ये कैसी तकरार,
टूटी-फूटी अंग्रेज़ी,
जो ज़ुबां पर करती वार।

ज्ञान को भाषा से जोड़ना,
कहाँ का इंसाफ़ है,
बाहर क्या दिखाए तू,
भीतर बिगड़ा हिसाब-किताब है।

आज के समाज का ये बदला कैसा चाल-चलन,
अपने में ही सीमित तू,
अपने में ही है मगन।

छोटा-बड़ा हर कोई इसकी चपेट में है,
भेद नहीं करती, सबकी दाढ़ी पेट में है।

अजब-ग़ज़ब ढंग दिखे आज के बाज़ार में,
चंगू जी बिक गए दिखावे के संसार में।

खाने का स्वाद बचा न पहनने का तरीका,
टीम-टाम में बिक गया बंदे का सलीका।

ऊँ-आउच तक रह गई मानव की सभ्यता,
झूठे भ्रम में हो रही ये कैसी दुर्दशा।

5 thoughts on “दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *