दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता
यह कविता आधुनिक समाज के दिखावे, दोगलेपन और खोते मानवीय सलीके पर सवाल उठाती है। बाहरी चमक और भाषा के आडंबर में दबते चरित्र और विचारों की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है।

यह कविता आधुनिक समाज के दिखावे, दोगलेपन और खोते मानवीय सलीके पर सवाल उठाती है। बाहरी चमक और भाषा के आडंबर में दबते चरित्र और विचारों की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है।