दो चेहरे

आज का समाज दो चेहरों में जी रहा है एक वह जो भीतर सचमुच है और दूसरा वह जो बाहर दुनिया को दिखाया जाता है। खुशियाँ अब साझा कम और तुलना ज़्यादा बन गई हैं, जहाँ किसी की तरक्की दूसरे के भीतर जलन जगा देती है। झूठे वादों और बनावटी शान-ओ-शौकत के शोर के बीच बचपन चुपचाप वही सीख रहा है जो हम जी रहे हैं। अगर समय रहते हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ी को सच्चाई नहीं, बल्कि सिर्फ़ दिखावे से भरी एक चमकदार लेकिन खोखली दुनिया विरासत में मिलेगी।

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रावण का कद बढ़ रहा है ?

यह लेख दशहरे के प्रतीक रावण के पुतले को मात्र लकड़ी और कागज़ का नहीं बल्कि समाज में बढ़ते अहंकार, लालच, क्रोध और दिखावे का प्रतीक बताता है। जैसे-जैसे पुतले का कद हर साल बढ़ता है, वैसा ही हमारे विचारों और आचरण में भी बुराई का आकार बढ़ रहा है। असली विजयादशमी तब होगी जब हम केवल पुतले जलाने तक सीमित न रहकर अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध को जलाएँ, दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें और सादगी, सत्य और नैतिकता को जीवन का आधार बनाएँ। लेख समाज में व्याप्त बुराई और दिखावे के प्रति चेतावनी देते हुए पाठकों को आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है।

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दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता

इस व्यंग्यात्मक कविता में आधुनिक सभ्यता पर तीखा प्रहार किया गया है, जहाँ दिखावे की चकाचौंध में इंसान की असली पहचान खोती जा रही है। हर वर्ग, हर उम्र इस बनावटी संस्कृति की चपेट में है — चाहे वह भाषा हो, पहनावा हो, या जीवनशैली। ‘दाढ़ी पेट में है’ जैसे प्रतीकों के ज़रिए लेखक ने दिखावे की भूख को उजागर किया है, वहीं ‘चंगू जी बिक गए’ जैसे कटाक्षों से सामाजिक मूल्यों के पतन की ओर इशारा किया गया है। यह अंश समाज की दोहरी मानसिकता, भाषा के घमंड और आत्मकेंद्रित प्रवृत्तियों की एक झलक पेश करता है — जहाँ आंतरिक मूल्य गौण हो गए हैं और बाहरी प्रदर्शन ही सब कुछ बन गया है।

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एक पर्यावरणविद् मंच पर भाषण देते हुए, पीछे लक्ज़री कार का दृश्य

वे बेचारे……

यह व्यंग्यात्मक लेख आधुनिक समाज में बढ़ते दिखावटी पर्यावरणवाद और नैतिक पाखंड पर तीखा प्रहार करता है। कहानी एक ऐसे गुरुजी से शुरू होती है, जो गांव की पाठशाला में बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और सादगी का पाठ पढ़ाते हैं। उनके आदर्श, उनके विचार और उनका जीवन सब कुछ इतना प्रभावशाली होता है कि लोग उन्हें भगवान जैसा मानने लगते हैं।

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