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झुकी हुई रीढ़ के प्रतीक के रूप में लोकतंत्र, चुनावी रैली, भीड़ और मंच पर खड़े नेता का व्यंग्यात्मक दृश्य

लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़

लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उसकी रीढ़ भीड़ और दिखावे के बोझ तले झुकती नजर आती है। चुनावी रैलियाँ संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गई हैं, जहाँ नागरिकों को गिना जाता है, समझा नहीं जाता। जनकल्याणकारी योजनाएँ अधिकार नहीं, बल्कि चुनावी उपहार की तरह परोसी जा रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में मतदाता धीरे-धीरे ग्राहक में बदलता जा रहा है। फिर भी उम्मीद कायम है जब जनता सवाल पूछती है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, तभी लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़ फिर से सीधी होने लगती है।

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