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कथनी और करनी के अंतर पर आधारित सामाजिक व्यंग्य हमाम के नंगे

हमाम के नंगे

जाति और धर्म से ऊपर उठने की बातें करने वाला आदर्शवाद जब रोजमर्रा के व्यवहार की छोटी-सी परीक्षा में बदल जाता है, तब कथनी और करनी का अंतर उजागर हो जाता है।

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मौलिक रचना बनाम कॉपी-पेस्ट

ऑर्गेनिक कहानी

जब मेहनत से उगाई गई ऑर्गेनिक सब्ज़ियों का स्वाद अलग होता है, तो क्या मौलिक रचना और चोरी की पंक्ति में भी कोई फ़र्क़ नहीं होना चाहिए? ‘ऑर्गेनिक कहानी’ इसी सवाल पर तीखा व्यंग्य है.

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मंत्री के स्वागत में जुटी कॉलोनी और लोकतंत्र पर राजनीतिक व्यंग्य

मंत्री आईं तो बन गईं देवी ! 

मंत्री के दस मिनट के दौरे के लिए पंडाल, कारपेट, भजन, जय-जयकार और मिठाई तक. इस व्यंग्य में एक बच्चे का मासूम सवाल लोकतंत्र में जनता की भूमिका और राजनीतिक चेतना की पूरी कहानी सामने रख देता है।

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सावन सोमवार पर हास्य व्यंग्य लेख, शिव भक्ति और जीवन का संदेश

सावन सोमवार और रिश्तों की तलाश

सावन सोमवार आते ही व्रत, पूजा और मनचाहे वर की कामनाओं का दौर शुरू हो जाता है। लेकिन क्या सिर्फ उपवास से जिंदगी की खुशियां मिल जाती हैं? एक हल्के-फुल्के अंदाज में यह व्यंग्य बताता है कि खुद को बेहतर बनाना, अच्छे कर्म करना और जीवन का आनंद लेना भी उतना ही जरूरी है।
सावन का मजा लीजिए, भक्ति को सच्चे मन से निभाइए और खुद को इतना काबिल बनाइए कि खुशियां खुद आपके दरवाजे तक आएं।

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पूजा सामग्री की दुकान में आपस में चर्चा करती दो कौड़ियाँ और पास में हँसता हुआ कॉकरोच, जो सामाजिक और मीडिया व्यंग्य का प्रतीक है।

उलझन

जब कौड़ियाँ चर्चा का विषय बन जाएँ, पत्रकार और शिक्षक आमने-सामने खड़े हो जाएँ और कॉकरोच हँसने लगें, तब जन्म लेता है एक ऐसा व्यंग्य जो समाज की विडंबनाओं को आईना दिखाता है।

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पश्चिम बंगाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री की कुर्सी के पास दृढ़ मुद्रा में खड़ी एक प्रभावशाली महिला नेता, चारों ओर मीडिया कैमरे, राजनीतिक झंडे और चुनावी माहौल दिखाई देता हुआ व्यंग्यात्मक दृश्य।

खूब लड़ी मर्दानी, झांसा वाली रानी..

बंगाल की राजनीति पर आधारित यह व्यंग्य सत्ता, हार-जीत, इस्तीफे और राजनीतिक नाटकों की विडंबना को हास्य और तंज के माध्यम से बेहद रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत करता है।

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विश्व पुस्तक मेले में उज्जैन की गूंज: ‘व्यंग्य के रंग’ में शामिल डॉ. हरीशकुमार सिंह

राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘व्यंग्य के रंग’ में उज्जैन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरीशकुमार सिंह की रचना का चयन शहर के लिए गौरव का विषय बना।

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