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पुश्तैनी घर

पुश्तैनी घर ईंट-पत्थर नहीं होते, वे पीढ़ियों की साँसें सँजोए रहते हैं। उनकी दीवारों में हँसी की गूँज, डाँट की तपिश और रिश्तों की गर्माहट कैद रहती है। जब हम उन्हें छोड़ देते हैं, वे धीरे-धीरे खंडहर नहीं, मौन पीड़ा में बदलते हैं जीते-जी मरते हुए।

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रिश्तों की अहमियत समझो, डस्टबिन में मत डालो

सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।

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